लेख
16-Mar-2026
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टॉय ट्रेन में मीडिया मित्रों के संग प्रकृति से आत्मीय संवाद — घुमावदार पहाड़ों, हरियाली और चाय की खुशबू में बसती प्रकृति की अद्भुत व अलबेली दुनिया का आनंद दक्षिण भारत की धरती अपने भीतर प्रकृति की ऐसी अनुपम छवियाँ समेटे हुए है,जिन्हें देखकर मन अनायास ही विस्मय और श्रद्धा से भर उठता है।यहाँ के पर्वत, हरियाली,झरने और शांत वातावरण प्रकृति के उस दिव्य रूप का परिचय देते हैं,जो मनुष्य को जीवन की भागदौड़ से कुछ क्षणों के लिए दूर ले जाकर आत्मिक शांति का अनुभव कराते हैं। तमिलनाडु का औद्योगिक नगर कोयंबटूर और उससे लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित पर्वतीय पर्यटन नगरी ऊटी की यात्रा इसी प्राकृतिक वैभव का अद्भुत अनुभव कराती है।यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का साधारण मार्ग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मीय संवाद का ऐसा अवसर है,जो स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहता है। विगत दिनों हमें दिल्ली की भागदौड़ भरी जीवन-शैली से कुछ समय के लिए अलग दक्षिण भारत की यात्रा का अवसर मिला।मीडिया मित्रों के साथ यह यात्रा किसी सामान्य पर्यटन कार्यक्रम से कहीं अधिक थी। यह मानो प्रकृति की गोद में बिताए गए उन अनमोल क्षणों का अनुभव था,जो जीवन की व्यस्तता के बीच मन को नई ऊर्जा और शांति प्रदान करते हैं।कोयंबटूर से ऊटी की ओर बढ़ते ही धरती का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने लगता है।मैदानी इलाकों की गर्म हवा शीतल पर्वतीय बयार में परिवर्तित हो जाती है।सीधी और सपाट सड़कों की जगह घुमावदार घाटियाँ दिखाई देने लगती हैं और शहरी कोलाहल की जगह चारों ओर फैली हरियाली यात्रियों का स्वागत करती प्रतीत होती है। यह मार्ग नीलगिरि पर्वतमाला की गोद से होकर गुजरता है। ‘नीलगिरि’ का अर्थ ही है-नीले पर्वत।दूर से देखने पर इन पहाड़ों की हरियाली और नीले आकाश का अद्भुत संगम इन्हें एक विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करता है।जैसे-जैसे हमारी कारों का काफिला ऊँचाई की ओर बढ़ रहा था,सड़कें सर्प की भाँति घुमावदार होती जा रही थीं।कुछ दूरी पर तीखे मोड़ आते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘हेयरपिन बेंड’ कहा जाता है।इन मोड़ों से नीचे झांकती घाटियाँ और दूर तक फैले पर्वत यात्रियों के मन में रोमांच भर देते हैं। कभी बादलों की हल्की परतें घाटियों में तैरती दिखाई देती हैं तो कभी सूर्य की किरणें पर्वतों की ढलानों को सुनहरी आभा से भर देती हैं। रास्ते भर फैले चाय के बागान इस यात्रा को और भी मनोहारी बना देते हैं।पर्वतों की ढलानों पर कतारों में सजे चाय के पौधे मानो किसी कलाकार की सजीव चित्रकला प्रतीत होते हैं।दूर-दूर तक फैली हरियाली और उसके बीच काम करती महिला मजदूरों की छवियाँ इस दृश्य को और भी जीवंत बना देती हैं। सिर पर टोकरी, हाथों में चाय की कोमल पत्तियाँ और चेहरे पर श्रम की सहज मुस्कान-यह सब मिलकर प्रकृति और श्रम के सुंदर समन्वय का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है।यह क्षेत्र भारत के प्रमुख चाय उत्पादन क्षेत्रों में गिना जाता है और नीलगिरि की चाय विश्व भर में अपनी सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है।हमारी इस यात्रा का सबसे स्मरणीय और रोमांचक अनुभव तब मिला जब मीडिया मित्रों के साथ प्रसिद्ध नीलगिरि माउंटेन रेलवे की टॉय ट्रेन में बैठने का अवसर प्राप्त हुआ।यह छोटी- सी पर्वतीय रेलगाड़ी मानो प्रकृति की गोद में धीरे-धीरे सरकती हुई आगे बढ़ती है। पटरियों के दोनों ओर फैली हरियाली, छोटी-छोटी सुरंगें,गहरी घाटियाँ और दूर तक फैले चाय के बागान—इन सबके बीच यह रेल यात्रा किसी चलचित्र की तरह आँखों के सामने खुलती चली जाती है।जब ट्रेन किसी मोड़ से गुजरती है तो पूरी रेलगाड़ी का दृश्य सामने दिखाई देने लगता है।ऐसा लगता है मानो पहाड़ों की गोद में कोई रंगीन रेखा धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हो। कभी ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती है तो कुछ क्षणों के लिए अंधकार छा जाता है।जैसे ही बाहर निकलती है,सामने हरियाली से भरा दृश्य यात्रियों का स्वागत करता है। टॉय ट्रेन की इस यात्रा को और भी रोचक बना दिया हमारे मीडिया साथियों ने। किसी ने गीत की पंक्ति छेड़ी तो किसी ने उसे आगे बढ़ाया और देखते ही देखते पूरे डिब्बे में अंताक्षरी का दौर शुरू हो गया। पहाड़ों के बीच गीतों की मधुर धुन गूंजने लगी। प्रकृति की शांति और मित्रों की हँसी-ठिठोली के बीच यह यात्रा सचमुच अविस्मरणीय बन गई।इस यात्रा में वरिष्ठ पत्रकार सुजीत ठाकुर के साथ मीडिया जगत की सक्रिय सहयोगीलाइगा आशिफ,(समुह संपादिका) शिवानी शर्मा, भावना गुप्ता,सपना,आकाश त्रिवेदी,अभिषेक,समीर,सुरेन्द्र पंडित और रिपुंज तिवारी सहित अनेक मीडिया मित्र उपस्थित थे।रास्ते भर संवाद, हास्य परिहास और गीतों का यह वातावरण यात्रा को और भी जीवंत बना रहा था।विशेष वरिष्ट मीडिया मित्र सुजीत ठाकुर व रिपुंज तिवारी ने ऐसा समा बंधा कि हम सुर- संगीत की महफिल में पहुंचे हो।इस अवसर पर आयोजन से जुड़े कुछ सरकारी अधिकारी तथा अन्य आमंत्रित अधिकारी जो अतिथि भी हमारे साथ थे,जिनकी उपस्थिति ने इस यात्रा को एक सामूहिक अनुभव का रूप दे दिया।रास्ते में पहाड़ों से उतरते छोटे-छोटे झरने यात्रियों का स्वागत करते दिखाई देते हैं।कहीं चट्टानों के बीच से पतली जलधारा गिरती है तो कहीं हरियाली के बीच से फूटते झरने मधुर संगीत की तरह सुनाई देते हैं।प्रकृति का यह स्वाभाविक संगीत मन को एक अनूठी शांति प्रदान करता है।बरसात के मौसम में इन झरनों की संख्या और भी बढ़ जाती है और पूरा क्षेत्र जलधारा और हरियाली का उत्सव बन जाता है।संध्या होते-होते हम ऊटी पहुँचे और वहीं रात्रि विश्राम का अवसर मिला। पहाड़ों की ठंडी हवा,चारों ओर फैली शांति और दूर-दूर तक पसरी हरियाली ने वातावरण को अत्यंत सुकूनभरा बना दिया।शहर की भागदौड़ से दूर यह शांत रात्रि मानो प्रकृति की गोद में विश्राम करने जैसा अनुभव दे रही थी। अगली सुबह का दृश्य तो और भी अद्भुत था।प्रातःकाल जब भुवन- भास्कर सूर्यदेव की पहली किरणें पर्वतों की चोटियों पर पड़ीं, तो वह दृश्य सचमुच दिव्य और अलौकिक प्रतीत हुआ।पहाड़ों के पीछे से धीरे-धीरे उगता सूर्य,धुंध की हल्की परतों के बीच फैलती सुनहरी रोशनी और उस प्रकाश में चमकती हरियाली - यह दृश्य मन को एक आध्यात्मिक शांति से भर देता है।ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रकृति ने अपने आंचल से दिन का स्वागत किया हो।ऊटी का प्राकृतिक सौंदर्य वास्तव में अद्वितीय है।यहाँ की झीलें,उद्यान और पर्वतीय दृश्य पर्यटकों को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं।ऊटी झील के शांत जल में तैरती नौकाएँ और उसके चारों ओर फैली हरियाली मन को एक अनोखी शांति का अनुभव कराती है। वहीं प्रसिद्ध सरकारी बोटैनिकल गार्डन दुर्लभ पौधों और रंग-बिरंगे फूलों की अद्भुत दुनिया प्रस्तुत करता है। नीलगिरि पर्वतमाला जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। यहाँ के घने जंगलों में अनेक प्रकार के वन्यजीव और पक्षी पाए जाते हैं।कभी-कभी रास्ते में बंदरों के समूह यात्रियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं,जबकि जंगलों की गहराइयों में हाथी, हिरण और अन्य वन्यजीव भी निवास करते हैं।कोयंबटूर से ऊटी तक की यह यात्रा प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता का भी परिचय कराती है।रास्ते में स्थानीय जनजातीय समुदायों की झलक भी देखने को मिलती है,जिनकी जीवन शैली प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।उनके पारंपरिक घर, पहनावा और जीवन-दृष्टि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध बनाते हैं।दरअसल,कोयंबटूर से ऊटी तक की यह यात्रा हमें प्रकृति के उस सौंदर्य से रूबरू कराती है,जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना संभव नहीं।घुमावदार सड़कों से गुजरते हुए जब पहाड़ों की ठंडी हवा चेहरे को छूती है,जब चाय के बागानों की हरियाली आँखों को सुकून देती है और जब झरनों की कल-कल ध्वनि कानों में मधुर संगीत की तरह गूंजती है,तब लगता है कि मानव और प्रकृति के बीच का यह संबंध कितना गहरा और आत्मीय है। अंततः कहा जा सकता है कि कोयंबटूर से ऊटी तक की यह यात्रा केवल पर्यटन नहीं,बल्कि प्रकृति के साथ एक आत्मिक अनुभव है। नीलगिरि की हरियाली,पहाड़ों की घुमावदार राहें,हरे चाय बगानों की सुगंध,झरनों का मधुर संगीत,टॉय ट्रेन की धीमी यात्रा और मीडिया मित्रों के साथ बीते हुए जमाने के मधुर गीतों की अंताक्षरी-ये सब मिलकर इस यात्रा को अविस्मरणीय बना दी।मै स्पष्ट कर दूँ कि जो भी यात्री एक बार इस मार्ग से होकर ऊटी पहुँचता है,उनके मन मस्तिक में यात्रा की स्मृतियाँ लंबे समय तक जीवित रहती हैं।ऐसा लगता है,मानो प्रकृति ने स्वयं अपनी गोद में बैठाकर उसे कुछ स्वर्णिम और अनमोल क्षण उपहार में दे दिए हों। (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 17 मार्च /2026