लेख
16-Mar-2026
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पश्चिम एशिया (मध्य-पूर्व) में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चिंतित कर दिया है। विशेष रूप से जलडमरू मध्य और लाल सागर जैसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर सवाल उठने लगे हैं। ये दोनों मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार की जीवनरेखा माने जाते हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है और जिसके लाखों नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं, इस संकट से सीधे और परोक्ष—दोनों तरह से प्रभावित हो सकता है।सबसे पहला और सबसे बड़ा खतरा तेल आपूर्ति से जुड़ा है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र जैसे सऊदी अरब,ईराक,यूएई, और कुवैत से आता है। इन देशों से आने वाला अधिकांश तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है या जहाजों की आवाजाही सीमित होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। तेल महँगा होने का सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, बिजली उत्पादन और अंततः खाद्य वस्तुओं तक पर पड़ता है। परिणामस्वरूप महँगाई बढ़ती है और आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। दूसरा बड़ा प्रभाव समुद्री व्यापार और शिपिंग लागत पर पड़ता है। युद्ध या हमले की आशंका बढ़ने पर जहाज कंपनियाँ अतिरिक्त “वॉर-रिस्क इंश्योरेंस” लेती हैं, जिससे परिवहन लागत बढ़ जाती है। कई बार जहाज जोखिम वाले मार्गों से बचकर लंबा रास्ता अपनाते हैं, जैसे लाल सागर से होकर आने के बजाय अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप आफ गुड होप से घूमकर आना। इससे यात्रा समय 10–15 दिन तक बढ़ सकता है और माल ढुलाई महँगी हो जाती है। इसका असर आयातित वस्तुओं—जैसे उर्वरक, खाद्य तेल, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स—की कीमतों पर पड़ता है, जो घरेलू बाजार में महँगाई को और बढ़ा सकता है। तीसरा महत्वपूर्ण पहलू गैस आपूर्ति का है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, विशेष रूप से कतर से तरलीकृत प्राकृतिक गैस एलएनजी। यदि समुद्री मार्ग असुरक्षित हो जाते हैं, तो गैस की आपूर्ति बाधित हो सकती है या महँगी हो सकती है। इससे बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग और शहरी गैस वितरण पर प्रभाव पड़ेगा, जिसका व्यापक असर उद्योग और कृषि दोनों पर पड़ सकता है। चौथा और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा रेमिटेंस (विदेश से भेजा गया पैसा) का है। खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं, विशेषकर यूएई, सऊदी अरब,कतर,और कुवैत में। ये प्रवासी हर वर्ष अरबों डॉलर भारत भेजते हैं, जो देश के विदेशी मुद्रा भंडार और लाखों परिवारों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। यदि क्षेत्र में युद्ध या आर्थिक मंदी आती है, तो निर्माण, तेल और सेवा क्षेत्रों में रोजगार घट सकता है, वेतन कम हो सकता है या भारतीयों की बड़े पैमाने पर वापसी हो सकती है। इससे रेमिटेंस घटेगा और उन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर विशेष असर पड़ेगा जहाँ प्रवासी आय का बड़ा हिस्सा आता है। हालाँकि भारत पूरी तरह असहाय नहीं है। देश ने जो रणनीतिक तेल भंडार विकसित किए हैं वे सीमित हैं,और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश रूस,ब्राजील और यूएस जैसे देशों से आयात बढ़ाकर की जानी चाहिए।इसके अलावा भारतीय नेवी समुद्री क्षेत्र में सक्रिय निगरानी और भारतीय जहाजों की सुरक्षा के लिए तैनात रहती है। भारत की विदेश नीति भी सभी प्रमुख देशों से संबंध बनाए रखने की कोशिश करती है ताकि संकट की स्थिति में आपूर्ति और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। फिर भी, सबसे खराब स्थिति—यदि होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाए या व्यापक युद्ध छिड़ जाए—तो भारत को “दोहरी मार” झेलनी पड़ सकती है: एक ओर तेल और गैस की कीमतों में उछाल, दूसरी ओर रेमिटेंस में गिरावट। इससे महँगाई, चालू खाता घाटा, रुपये पर दबाव और आर्थिक विकास दर—सभी प्रभावित हो सकते हैं। खाड़ी क्षेत्र का संकट भारत के लिए केवल एक दूरस्थ भू-राजनीतिक घटना नहीं है बल्कि एक प्रत्यक्ष आर्थिक और सामाजिक चुनौती है। हालांकि भारत के पास कुछ सुरक्षा उपाय और विकल्प मौजूद हैं, लेकिन दीर्घकालीन समाधान ऊर्जा आत्मनिर्भरता, नवीकरणीय स्रोतों के विस्तार और प्रवासी आय पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में ही निहित है। वर्तमान परिस्थितियाँ भारत को अपनी ऊर्जा और आर्थिक रणनीति को और अधिक मजबूत तथा विविध बनाने की आवश्यकता की याद दिलाती हैं। भारतीय तेल स्रोत्रों का उत्पादन बढा़ना समय का तकाजा है।क्या ऐसा हो पायेगा? (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) ईएमएस / 16 मार्च 26