राष्ट्रीय
18-Mar-2026
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कोर्ट ने कहा- निष्क्रिय बैंक खातों की जानकारी वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती? नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों में पड़े पूर्वजों के अनक्लेम्ड यानी लावारिस पैसों को लेकर केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा है कि मृत व्यक्तियों के निष्क्रिय बैंक खातों की जानकारी उनके कानूनी उत्तराधिकारियों यानी वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती? कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर सिस्टम खुला और सार्वजनिक डेटाबेस बना दिया गया तो हाउसफुल 4 जैसा फ्रॉड का खतरा बढ़ सकता है, जहां फर्जी दावेदारों की भीड़ लग सकती है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार और आरबीआई से एक याचिका पर नए हलफनामे मांगे हैं। इस याचिका में एक सेंट्रलाइज्ड सिस्टम बनाने की मांग की गई है, ताकि परिवारों और कानूनी उत्तराधिकारियों को उनके मृत रिश्तेदारों के बैंक खातों, बीमा, शेयर और अन्य वित्तीय साधनों में पड़े लावारिस पैसों को ट्रैक करने और उन पर दावा करने में मदद मिल सके। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने केंद्र सरकार और आरबीआई को चार सप्ताह के भीतर अपने अपडेटेड जवाबी हलफनामे दाखिल करने को कहा है और मामले की अगली सुनवाई 5 मई के लिए तय की है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक सुचेता दलाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान बताया कि बड़ी संख्या में लोगों का पैसा इसलिए लावारिस पड़ा रहता है क्योंकि उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि यह पैसा कहां रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे अनक्लेम्ड पैसों को सरकार द्वारा नियंत्रित तीन अलग-अलग फंड्स में ट्रांसफर कर दिया जाता है- डिपॉजिटर्स एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड, इन्वेस्टर एजुकेशन एंड प्रोटेक्शन फंड और सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर फंड। भूषण ने बताया कि इन तीनों फंड्स में कुल मिलाकर एक लाख करोड़ से ज्यादा की राशि पड़ी है। भूषण ने अदालत से एक ऐसा सेंट्रलाइज्ड, सर्चेबल डेटाबेस बनाने का निर्देश देने का आग्रह किया, जिससे परिवार ऐसी संपत्तियों का आसानी से पता लगा सकें। उन्होंने इन पैसों पर दावा करने की प्रक्रिया को सरल बनाने का भी सुझाव दिया। उनका कहना था कि लंबी प्रोबेट यानी वसीयत के प्रमाणीकरण कार्यवाही के बजाय, वसीयत पेश करने, क्षतिपूर्ति बॉन्ड देने और विज्ञापन निकालने जैसे आसान तरीकों से उत्तराधिकारियों को पैसे क्लेम करने की सुविधा मिलनी चाहिए। पीठ ने दावों को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के अनुमति देने के सुझाव पर कड़ी आपत्ति जताई और इस तरह का ओपन सिस्टम बनाए जाने के दुरुपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के डेटा को सार्वजनिक करने और उसका एक्सेस देने से धोखेबाजों का एक और समूह पैदा हो जाएगा, जो क्लेम फाइल करना शुरू कर देंगे। क्या आपने ‘हाउसफुल 4’ फिल्म देखी है? ठीक वैसा ही होगा। आरबीआई के वकील ने दलील दी कि मौजूदा सुरक्षा उपाय, जैसे केवाईसी नियम और नॉमिनेशन की अनिवार्यता, इस समस्या का समाधान पहले ही करते हैं। उन्होंने कहा कि बैंक आज नॉमिनी का नाम देने पर जोर देते हैं। हर साल केवाईसी करना जरुरी है। एक सेंट्रल केवाईसी भी है, जिसे आधार से भी जोड़ा जा सकता है। आरबीआई के वकील ने तर्क दिया कि बैंक ऐसे फंड को ट्रस्ट के रूप में रखते हैं और उचित कानूनी सत्यापन के बिना पैसे जारी नहीं कर सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि बैंक दावा करने वाले व्यक्ति की सत्यता से संतुष्ट नहीं हैं, तो वे केवल इन्डेम्निटी बॉन्ड के आधार पर पैसा नहीं सौंप सकते। कोर्ट ने यह देखते हुए कि केंद्र और आरबीआई ने अपने हलफनामे में इन सभी पहलुओं पर पूरी तरह से जवाब नहीं दिया है, उन्हें चार सप्ताह के अंदर नए सिरे से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। सुनवाई समाप्त होने पर प्रशांत भूषण ने कोर्ट को याद दिलाया कि अधिकारियों ने पहले संकेत दिया था कि जुलाई 2023 तक एक सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस तैयार कर लिया जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा कोई सिस्टम लागू नहीं किया गया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि पहले नए हलफनामे आने दीजिए, फिर हम कोई फैसला लेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई अब 5 मई को तय की गई है। सिराज/ईएमएस 18मार्च26 --------------------------------