राज्य
21-Mar-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में पुलिस द्वारा आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर आरोपियों की तस्वीरें और जानकारी साझा करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में कहा गया है कि यह कार्यशैली आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों द्वारा आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल का उपयोग करके आरोपियों की तस्वीरें, वीडियो और जानकारी शेयर करने की बढ़ती प्रथा के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि इस तरह की कार्यशैली से आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता खतरे में पड़ सकती है। इससे आपराधिक न्याय प्रणाली का संपूर्ण कार्य बाधित होता है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने ऐसे उदाहरणों का जिक्र किया जहां आरोपियों को रस्सी और हथकड़ी के साथ घुमाया गया और पुलिस खातों द्वारा उनकी तस्वीरें ऑनलाइन व्यापक रूप से प्रसारित की गईं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने बताया कि पूर्व निर्देशों के अनुसार दिशानिर्देश पहले से ही मौजूद हैं। राज्यों को नियम बनाने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था। जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने स्थिति को स्वीकार किया लेकिन विस्तार से स्पष्ट किया कि पीयूसीएल मामले पर आधारित मौजूदा ढांचा केवल पुलिस ब्रीफिंग तक सीमित है। उन्होंने बताया कि इसमें पुलिस द्वारा आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल का उपयोग करके आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो अपलोड करने के उभरते मुद्दे को विशेष रूप से संबोधित नहीं किया गया है। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक फरार जोड़े की ओर से सुरक्षा देने का अनुरोध करने वाली एक याचिका पर सुनवाई की। न्यायालय ने याचिकाकर्ता से कहा कि इस राहत के लिए वो दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करें। दिलचस्प बात यह है कि जिस वकील ने कपल के लिए सुरक्षा के लिए याचिका दाखिल की थी, उन्हें वह सुप्रीम कोर्ट के पार्किंग क्षेत्र में ही मिला था। वकील ने कहा कि जोड़ा इस गलत धारणा के साथ सुप्रीम कोर्ट आया था कि वह न्यायालय परिसर में ही शादी कर सकता है। इसके साथ ही कोर्ट उसे तुरंत सुरक्षा देगा। कपल को डर है कि उसे नुकसान पहुंचाया जा सकता है। उनके माता-पिता कठोर सजा दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए हाई कोर्ट का रुख करें। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/21/मार्च/2026