राज्य
02-Apr-2026
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बालाघाट (ईएमएस)। न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के एक अहम मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए बालाघाट निवासी याचिकाकर्ता जितेंद्र उर्फ राजा लिल्होरे पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए निर्धारित समय सीमा के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने के निर्देश भी दिए हैं। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि तथ्यों को छुपाकर बार-बार याचिका दायर करना न्यायिक व्यवस्था के साथ छल करने जैसा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला रिट याचिका क्रमांक 2714/2026 से जुड़ा हुआ है, जिसमें नदी किनारे रेत उत्खनन को लेकर कार्रवाई की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से अवैध उत्खनन के खिलाफ हस्तक्षेप की अपील की थी। सुनवाई के दौरान राज्य पक्ष ने न्यायालय को बताया कि याचिकाकर्ता पहले भी इसी विषय को लेकर विभिन्न मंचों और न्यायालयों में याचिकाएं प्रस्तुत कर चुका है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि वर्तमान याचिका में इस तथ्य का उल्लेख नहीं किया गया था। इसे न्यायालय ने गंभीरता से लिया और माना कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर आवश्यक जानकारी छुपाई है। सुनवाई के दौरान जब यह जानकारी सामने आई, तो न्यायालय ने याचिका वापस लेने की अनुमति देने से इंकार कर दिया और याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से संशोधन आवेदन प्रस्तुत कर पूर्व में दायर याचिकाओं को रिकॉर्ड पर लाने का प्रयास किया गया। साथ ही यह दलील दी गई कि विधिक जानकारी के अभाव में यह तथ्य शामिल नहीं हो पाया और इसके लिए क्षमा याचना भी की गई। हालांकि न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक ही विषय पर बार-बार याचिका दायर करना और तथ्यों को छुपाना न्यायालय के समय और संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी है। इससे न्यायिक प्रणाली की गरिमा पर भी आंच आती है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इस तरह की प्रवृत्ति से याचिकाकर्ता की मंशा संदिग्ध प्रतीत होती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को निरस्त करते हुए जितेंद्र उर्फ राजा लिल्होरे पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना अधिरोपित किया। साथ ही निर्देश दिए कि निर्धारित समयावधि में राशि जमा नहीं करने पर आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी। न्यायालय ने कड़ी चेतावनी भी दी कि भविष्य में यदि इस प्रकार की पुनरावृत्ति होती है, तो अवमानना की कार्रवाई भी की जा सकती है। इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और गंभीरता बनाए रखने की दिशा में एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।