राष्ट्रीय
09-Apr-2026
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:: धर्म, संविधान और सियासत का त्रिकोण : वंदन पर छिड़ी जंग में पार्षद निष्कासित, अपनों ने भी झाड़ा पल्ला :: इंदौर (ईएमएस)। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के नगर निगम में बुधवार को उस समय सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया, जब बजट सत्र की शुचिता और राष्ट्रवाद के नारों के बीच एक इनकार ने हंगामे का बवंडर खड़ा कर दिया। कांग्रेस पार्षद फौजिया शेख अलीम द्वारा वंदे मातरम गाने से मना करने के बाद सदन रणक्षेत्र में तब्दील हो गया, जिसके चलते उन्हें सभापति के कड़े आदेश पर सदन से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सदन की कार्यवाही की परंपरा के अनुसार जैसे ही राष्ट्रगीत वंदे मातरम की धुन गूंजी, कांग्रेस पार्षद फौजिया अलीम ने अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए खामोश रहने का फैसला किया। यह देखते ही सत्ताधारी भाजपा के पार्षदों का धैर्य जवाब दे गया। देशभक्ति के नारों के साथ भाजपा सदस्यों ने सभापति मुन्नालाल यादव के पोडियम को घेर लिया और पार्षद के खिलाफ राष्ट्र द्रोह जैसी सख्त कार्रवाई की मांग करने लगे। हंगामे की तीव्रता को देखते हुए सभापति ने तत्काल प्रभाव से पार्षद को सदन से निष्कासित कर दिया। :: आस्था बनाम अधिकार की दलील :: सदन की दहलीज से बाहर निकलते ही फौजिया अलीम ने इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 उन्हें अपनी मान्यताओं के अनुसार जीने का अधिकार देता है और किसी को भी मजबूरन राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि इस्लाम में इबादत और वंदन सिर्फ अल्लाह के लिए है, इसलिए वे मां तुझे सलाम जैसे भाव वाले शब्दों का गायन नहीं कर सकतीं। पार्षद ने इसे भाजपा की एक सोची-समझी साजिश बताते हुए कहा कि दूषित पेयजल जैसे गंभीर जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए राष्ट्रगीत को ढाल बनाया गया है। :: अपनों ने मोड़ा मुंह, महापौर का तीखा प्रहार :: इस विवाद में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब कांग्रेस पार्टी के भीतर ही इस मुद्दे पर दरार नजर आई। नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे ने फौजिया अलीम के स्टैंड को उनकी व्यक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड़ लिया। चौकसे ने भावुक होते हुए कहा कि वंदे मातरम हर भारतीय की रगों में दौड़ता है और इसका गायन अनिवार्य होना चाहिए। दूसरी ओर, महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पार्षद पर आदतन अपराधी होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पार्षद अक्सर सदन में देरी से ही इसलिए आती हैं ताकि उन्हें राष्ट्रगीत की गरिमा में शामिल न होना पड़े। :: ऐतिहासिक टीस :: 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी की कलम से निकले और आनंदमठ के जरिए देश की रगों में जोश भरने वाले इस गीत ने आज एक बार फिर नगर निगम की दहलीज पर आस्था, अधिकार और राजनीति के पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। जहाँ एक पक्ष इसे राष्ट्रभक्ति की कसौटी मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे संवैधानिक स्वतंत्रता के चश्मे से देख रहा है। प्रकाश/09 अप्रैल 2026