क्षेत्रीय
25-Apr-2026
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मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में दो पूर्व घरेलू सहायकों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने खुद को किरायेदार का परिवार सदस्य बताते हुए किरायेदारी अधिकार का दावा किया था। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जो व्यक्ति परिवार का सदस्य नहीं है, वह किरायेदारी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और आरती साठे की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने 2002 के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें इन दोनों को ‘अतिक्रमणकारी’ (ट्रेसपासर) करार दिया गया था। कोर्ट ने आदेश दिया कि दक्षिण मुंबई के फ्रेंच ब्रिज इलाके में स्थित फ्लैट को दोनों आठ हफ्तों के भीतर खाली करें। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहे कि वे किरायेदार के परिवार के सदस्य थे। - 1985 से चल रही थी कानूनी लड़ाई यह मामला 1985 में शुरू हुआ था, जब फ्लैट के मालिक ने सिटी सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर घरेलू सहायकों को अतिक्रमणकारी बताते हुए हटाने की मांग की थी। इसके बाद से अब तक सभी अदालतों ने मकान मालिक के पक्ष में ही फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने कहा कि घरेलू सहायकों को सिर्फ किरायेदार की सेवा और देखभाल के लिए रहने की अनुमति दी गई थी, जो पूरी तरह व्यक्तिगत सुविधा के लिए थी। उन्हें किसी भी तरह का कानूनी अधिकार नहीं दिया गया था। मकान मालिकों की ओर से वरिष्ठ वकील संजीव गोरवाडकर ने दलील दी कि घरेलू सहायकों को किराया कानून के तहत कोई संरक्षण नहीं मिलता, क्योंकि वे न तो परिवार के सदस्य हैं और न ही कानूनी उत्तराधिकारी। अदालत ने यह भी कहा कि किराया कानून का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता कि मकान मालिक के अधिकार ही खत्म हो जाएं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना कानून के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। - २५ अप्रैल/२०२६/ईएमएस