क्षेत्रीय
04-May-2026


दमोह (ईएमएस)। विगत दिवस मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई दमोह द्वारा होटल मंगलम के सभागार में काव्य कृति विमोचन सम्पन्न हुआ। दमोह इकाई द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ कवि पत्र गोविन्द मकरंद दुबे की कृति कांटे कचनार हुए गति संग्रह केे विमोचन संगोष्ठी अध्यक्ष सत्य मोहन वर्मा, मुख्य अतिथि अभय तिवारी, विशिष्ट अतिथि कुंदन सिद्धार्थ जबलपुर रहे। दीप प्रज्वलन अतिथि सरकार उपरान्त इकाई अध्यक्ष रमेश तिवारी ने कृति और कृतिकार पर सामासिक वक्तव्य में कहा कि कृतिकार की प्रथम कृति ओस और आसू 1967 में सृजन संस्था दमोह द्वारा प्रकाशित हुई थी। उसके बाद मकरंद दुबे का गति लेखन चलता रहा। जो सत्तर के दशक में चलित गति शैली का अनुगामी सिद्ध हुआ। उसकी संग्रह का प्रकाशन अब संभव हो पाया। विशिष्ट अतिथि, कुंदन सिद्धार्थ ने कृति पर अपने आलेख मे कहा कि काॅटे कचनाए हुए भावप्रवण और हदयस्पर्शी गीत संग्रह है। 50 वर्ष पूर्व लिखे गये गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक और समकालीन है जितने तब थे। गीतों में कवि ने हमारे समाज हमारे आस पास की सच्चाई को कितनी प्रामाणिकता के साथ हमारे सम्मुख रखा है सच के पास सफेदी कम है पास झूठ के अधिक सियाही थी जिसकी आवाज तेज सच उसकी मानी गई गवाही अलग-अलग भाव भंगिमाओं से संपन्न है यह गति संग्रह पठनीय है। मुख्य अतिथि अभय तिवारी ने कहा कि मकरंद दुबे के गीत संग्रह के गति भले पचास वर्ष पूर्व लिखें गये हो किन्तु उनका सामाजिक सरोकार प्रकृति और मनुष्य के बीच व्याप्त विसंगतियों का व्यवस्थित लेख जोखा गीतों की लय में प्रवहमान हो रहा है। धरती करे निवेदन मौसम करे सिफारिश। फिर क्यों न हो खुशी की, वे रोक-टोक बारिश, परिवेश और परिप्रेक्ष्यगत वातावरण को आत्मसात कर गीतों में लय प्रवाह में आबद्ध यह गीत सृजन मकरंद दुबे के काव्य कौशल को उजागर करता है। कृतिकार गोविन्द मकरंद दुबे ने आत्म विभोर होकर कहा रसो वै सः रस ही ईश्वर है। कविता का रस ब्रहम है। ब्रह्मानंद को भी काव्यानंद के तुल्य माना गया है। संग्रह के गति पचास वर्ष पुराने है तथा उस काल खंड में लिखे जाने वाले नवगीतो-गीतो की तरह विविध बिम्बो और मानवीकरण के भावों से आपूरित है क्योंकि कविता कालजयी होती है। नित आनंदमयी होती है। वा संगति गति बनती है गीतों को दुनिया गाती है। कार्यक्रम अध्यक्ष सत्यमोहन वर्मा ने कहा कि कविता स्वयं की अनुभूतियों जब सार्वजनिक हो जाती है वह कविता है कविता हमारी जिंदगी का वो पर्दा है जिसे हम निरंतर छिपाते है। इसी कौशल और समर्थता को स्थापित करने वाले मकरंद के गीत इस संग्रह में है, जो बताते है कि समय की दीवार पर उकेरे हुए शब्द चित्रों को बाचे बिना इस गीतों की रचना संभव नहीं थी। गति शिल्प की सम्प्रेषणीयता से गीातो की आत्मा तक सहजता से पहुँचा जा सकता है। दृष्टव्य है लिया मौत से कर्ज, जन्म से बड़ी भूल की है। जीवन भर उसने पाई पाई बसूल की है। यह क्या कम साहस, हम हंसना भूल नहीं पाये। काॅटे है जीवन में तो, क्या फूल नहीं पाये। मकरंद ने अपने गीतों में अनुभूति को सच्चाई के साथ अपनी संवेदनाओं को संजोया है द्वितीय सत्र में मंचासीन अतिथियों व कृतिकार द्वारा कविता पाठ किया जाकर कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में नगर के साहित्यकार, पत्रकार गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही। इकाई सचिव मानव बजाज द्वारा आभार ज्ञापित किया गया। ईएमएस / 04 मई 2026