नई दिल्ली (ईएमएस)। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की ताजा रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के भू-जल स्तर की भयावह स्थिति पर गंभीर चिंता जाहिर की है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के कई प्रमुख क्षेत्रों में भू-जल का दोहन खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है, जिससे भविष्य में पानी का विकट संकट खड़ा होने की आशंका है। मालवा क्षेत्र, अपनी उपजाऊ मिट्टी के लिए प्रसिद्ध, अब भू-जल खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। विशेष रूप से उज्जैन जिले की स्थिति बेहद गंभीर है, जहां कुछ ब्लॉकों में भू-जल रिचार्ज से कहीं अधिक 144 प्रतिशत तक निकाला जा रहा है। उज्जैन के सभी छह ब्लॉक रेड अलर्ट श्रेणी में हैं। राजधानी भोपाल में भी भू-जल का दोहन 80 प्रतिशत के पार निकल गया है, और इसके तीनों ब्लॉक सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि भू-जल का उपयोग रिचार्ज की तुलना में कहीं अधिक हो रहा है। बुंदेलखंड क्षेत्र भी गहरे जल संकट का सामना कर रहा है। टीकमगढ़ के सभी ब्लॉक तेजी से रेड ज़ोन की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि टीकमगढ़ और छतरपुर के आधे हिस्सों में भू-जल का अंधाधुंध दोहन भविष्य के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहा है। भू-जल अधिकारियों का कहना है कि 70 प्रतिशत से अधिक भू-जल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए; इससे अधिक उपयोग ब्लॉक को असुरक्षित श्रेणी में डाल देता है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि पानी खींचने की यही गति बनी रही, तब आने वाले सालों में इन इलाकों में बोरवेल सिर्फ धूल निकलनी है। इसके प्रमाण अभी से मिलने लगे हैं। उज्जैन की खाचरोद तहसील के पथलासी गांव में 1100 फीट की गहराई पर भी पानी नहीं मिल रहा है, जहां 24 निजी बोरवेल में से केवल तीन ही सफल हुए और तीन सरकारी बोर भी सूखे पड़े हैं। वहीं, टीकमगढ़ के माडूमार गांव में 400 फीट पर भी पानी न होने के कारण किसान केवल खरीफ की फसल पर निर्भर हैं और रबी की बुवाई के लिए सिंचाई का पानी खरीदना पड़ता है। फिलहाल राहत की बात केवल सागर जिले से है, जहां सभी 11 ब्लॉक सुरक्षित श्रेणी में बने हुए हैं क्योंकि यहां 70 प्रतिशत से कम भू-जल का इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि, पूरे प्रदेश में बिगड़ती भू-जल स्थिति एक बड़े सूखे और जल संकट की ओर इशारा कर रही है, जिस पर तत्काल और प्रभावी कदम उठाने की नितांत आवश्यकता है। आशीष दुबे / 06 मई 2026