नई दिल्ली (ईएमएस)। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों धार्मिक परंपराओं, महिलाओं के अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को लेकर एक बेहद अहम सुनवाई चल रही है। सबरीमाला मामले से शुरू हुई यह कानूनी बहस अब केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका दायरा कई धार्मिक समुदायों की परंपराओं तक पहुंच चुका है। अदालत अब यह तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश, पारसी समुदाय में अंतरधार्मिक विवाह करने वाली महिलाओं के बहिष्कार और दाऊदी बोहरा समाज में सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रथाओं पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि क्या किसी महिला को विवाह के आधार पर समुदाय से अलग करना वास्तव में धार्मिक परंपरा है या फिर यह समय के साथ बनी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। बहस के दौरान पारसी महिलाओं की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि महिलाओं के बहिष्कार का कोई स्पष्ट धार्मिक आधार दिखाई नहीं देता और यह अधिकतर मानव निर्मित व्यवस्था प्रतीत होती है। न्यायपीठ ने यह भी जानना चाहा कि यदि पुरुषों को अलग नियमों के तहत स्वीकार किया जाता है तो महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था क्यों लागू हो। अब इस मामले में आने वाला फैसला केवल एक विवाद का समाधान नहीं करेगा, बल्कि यह देश में धर्म, समानता और संवैधानिक अधिकारों की नई दिशा भी तय कर सकता है। सुबोध/०६-०५-२०२६