अंतर्राष्ट्रीय
13-May-2026


काठमांडू (ईएमएस)। नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख विवाद फिर चर्चा में है। नेपाल में नई राजनीतिक परिस्थितियों और मानसरोवर यात्रा मार्ग को लेकर बढ़ती बहस के बीच, रणनीतिक विशेषज्ञों ने सरकार से इस मुद्दे पर भारत के साथ तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर बातचीत करने की अपील की है। नेपाल के विदेश मंत्रालय में प्रोटोकॉल के पूर्व प्रमुख गोपाल बहादुर थापा ने लेख में दावा किया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से नेपाल का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने 1816 की सुगौली संधि का हवाला देकर कहा कि काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत की पश्चिमी सीमा माना गया था और उस समय इसका वास्तविक उद्गम लिम्पियाधुरा क्षेत्र था। थापा ने आरोप लगाया कि 1856 के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान नक्शों में बदलाव कर सीमा को धीरे-धीरे पूर्व की ओर खिसकाया गया और लिपुलेख क्षेत्र को भारत की ओर दिखाया जाने लगा। विशेषज्ञ का कहना है कि 1816 से 1856 के बीच के कई आधिकारिक नक्शे, ब्रिटिश काल के सर्वे रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज और प्रशासनिक आदेश नेपाल के दावे का समर्थन करते हैं। उन्होंने सरकार को भावनात्मक राजनीति से बचते हुए एक डिप्लोमैटिक श्वेत पत्र जारी कर सभी ऐतिहासिक प्रमाणों को व्यवस्थित रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की सलाह दी, साथ ही जोर दिया कि नेपाल को भारत से बातचीत में डरना नहीं चाहिए। दूसरी ओर, भारत का रुख स्पष्ट है कि लिपुलेख क्षेत्र भारतीय सीमा का हिस्सा है और यहां की वर्तमान स्थिति ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक तथ्यों पर आधारित है। भारत ने हाल ही में नेपाल की आपत्ति को खारिज कर कहा था कि सीमा से जुड़े मुद्दों को द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल सीमा का नहीं, बल्कि भारत-नेपाल संबंधों की संवेदनशीलता से जुड़ा है। वर्तमान में जब चीन इस पूरे विवाद पर चुप्पी बनाए हुए है, दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति में यह मुद्दा आने वाले समय में महत्वपूर्ण बना रह सकता है। आशीष दुबे / 13 मई 2026