लेख
17-May-2026
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भारत इस समय सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों के ऐसे दौर से गुजर रहा है। जहां बेरोजगारी, महंगाई और पेपरलीक मामलों से युवाओं की बढ़ती निराशा गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। हाल ही में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी जिसमें बेरोजगारों को काकरोच जैसे शब्द से तुलना की गई उसको लेकर देशभर में मुख्य न्यायाधीश के बयान को लेकर बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया, पत्रकारिता और सूचना के अधिकार से जुड़े युवाओं एवं कार्यकर्ताओं ने इस बयान को संवेदनहीन बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। राजनीतिक दल सामाजिक कार्यकर्ता एवं वकीलों ने भी इस बयान की कड़ी आलोचना की है। यह अलग बात है कि सीजेआई ने अपने बयान पर स्पष्टीकरण भी दे दिया है। न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय स्तंभ है। उसके किसी भी वक्तव्य का समाज में व्यापक प्रभाव होता है। आज देश में करोड़ों की आबादी वाला बड़ा युवा वर्ग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है। सरकारी विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं। निजी क्षेत्र में रोजगार और नौकरी के अवसर सीमित होते जा रहे हैं। महंगाई और आर्थिक असमानता ने युवाओं की परेशानियों को बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में युवा अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाते हैं। उन्हें उपेक्षा या कठोर टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उनकी समस्या का कोई समाधान नहीं होता है। स्वाभाविक रूप से इससे असंतोष बढ़ता है। इतिहास गवाह है, जब किसी भी राष्ट्र में सामाजिक असमानता, आर्थिक संकट और संस्थागत असंवेदनशीलता बढ़ती है, ऐसी स्थिति में लोग अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष का वह सभी रास्ता चुन लेते हैं जो आमतौर पर आसान नहीं होता है। ऐसी स्थिति में ही बड़े परिवर्तन जन्म लेते हैं। अमेरिकन सिविल वार भी अमेरिका का केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था। अमेरिका में उस समय के आर्थिक और सामाजिक असंतुलन का परिणाम था। भारत की परिस्थितियों में जिस तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उसकी सीधी तुलना अमेरिका के गृहयुद्ध से करना उचित नहीं है। लेकिन जिस तरह के हालात बन गए हैं उससे अवश्य हमें समझना चाहिए। लगातार बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, आधुनिक बाजारवाद, महंगी शिक्षा, महंगी स्वास्थ्य सेवा, महंगे खाद्य पदार्थों और नीट जैसी परीक्षा के पेपर लीक के कारण जिस तरह की सामाजिक निराशा देखने को मिल रही है, वह किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे का सबसे बड़ा संकेत है। न्यायपालिका का दायित्व केवल कानून की व्याख्या करना ही नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। आम नागरिक, विशेषकर गरीब और बेरोजगार युवा, न्यायपालिका को अंतिम उम्मीद के रूप में देखते हैं। इसलिए न्यायिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्दों में संवेदनशीलता, संतुलन और सामाजिक जिम्मेदारी का होना अत्यंत आवश्यक है। सरकार, न्यायपालिका और समाज—तीनों को मिलकर यह समझना होगा, लोकतंत्र केवल आर्थिक विकास से मजबूत नहीं होता है। बल्कि नागरिकों के सम्मान, समान अवसर और न्याय और नैतिकता से मजबूत होता है। युवाओं को रोजगार, शिक्षा और न्याय की उम्मीद होगी, तभी देश में सामाजिक स्थिरता और विकास की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। भारत आज सबसे बड़ी युवा आबादी वाला पढ़ा लिखे युवाओं का देश है। जिस तरह के हालात देखने को मिल रहे हैं यह सामान्य नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भारत को सोच समझकर बड़ी जिम्मेदारी एवं जवाबदेही के साथ इस मुश्किल स्थिति से बाहर निकलना होगा। अन्यथा इसके दुष्परिणाम किसी भी रूप में सामने आ सकते हैं। ईएमएस / 17 मई 26