एक विध्वंस के अवशेष एक मां के मंदिर का सम्मान वापिस लौटाने के लिए गवाह बन गए।मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मान लिया है। हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार भी दे दिया। कोर्ट के इस फैसले के एक दिन बाद आज, रविवार को भोजशाला में पूजा-अर्चना और हवन हो रहा है। धार के कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना में शामिल हुए। कोर्ट ने हिंदू पक्ष की मूर्ति स्थापना की मांग को भी स्वीकार कर लिया है। हाल ही में हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि राजा भोज के काल में यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, इसलिए यहां मूर्ति स्थापना की जा सकती है। अदालत ने पुरातात्विक व ऐतिहासिक साक्ष्यों, पुरातत्व सर्वेक्षण भारत की रिपोर्ट, पुरातत्व संरक्षण एक्ट के प्रावधानों और अयोध्या मामले के फैसले को आधार बनाया है। इस फैसले के बाद आज 17 मई को भोजशाला मंदिर में मां वाग्देवी की प्रतीकात्मक प्रतिमा को विराजित कर दिया गया है। आपको बता दें कि लंबे समय से विवादों में रहे मध्य प्रदेश के धार जिले के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने शुक्रवार को मंदिर करार दिया। पीठ ने कहा कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट पर विचार करने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंची है कि संरक्षित स्थान देवी सरस्वती का मंदिर है। पीठ ने एएसआई द्वारा 2003 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मुसलमानों को परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी। उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं व उसके वैज्ञानिक सर्वेक्षण और कानूनी प्रावधानों की रोशनी में फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में शीर्ष अदालत के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। खंडपीठ ने सामाजिक संगठन हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी व अन्य लोगों की दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाएं मंजूर करते हुए कहा, भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में तय किया जाता है। भोजशाला को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने 7 अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया था। इसमें हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार भोजशाला में पूजा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार इस जगह नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। इस फैसले को मुस्लिम पक्ष ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की है। दूसरी ओर हिंदू पक्ष के एक याची जितेंद्र सिंह बिसेन की तरफ से शुक्रवार को ही उच्चतम न्यायालय में कैविएट दाखिल की गई जिसमें अनुरोध किया गया कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर कोई भी आदेश उसका पक्ष सुने बिना पारित नहीं किया जाए। गौरतलब है कि एएसआई ने भोजशाला परिसर का 98 दिनों तक सर्वे कर उसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की थी। इसमें कई अहम तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खोदाई में मूर्तियां, सिक्के और कई ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। इसमें कहा गया कि परमारकालीन भवन की नींव के पत्थरों पर बाद में निर्माण किया गया। सर्वे में मिले स्तंभों और वास्तुकला से संकेत मिलता है कि ये पहले मंदिर का हिस्सा रहे होंगे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण में इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि परिसर में चारों दिशाओं में 106 खड़े व 82 आड़े स्तंभमिले, यानी कुल 188 स्तंभ पाए गए। इनकी बनावट से संकेत मिलता है कि वे मूल रूप से मदिर स्थापत्य का हिस्सा थे। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया कि स्तंभों पर बनी देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में औजारों से क्षतिग्रस्त किया गया था। सर्वे में दो ऐसे स्तंभ भी मिले हैं, जिन पर ओम सरस्वत्यै नमः लिखा हुआ है। सर्वे रिपोर्ट के पेज नंबर 148 में उल्लेख किया गया है कि स्तंभों की वास्तुकला यह दर्शाती है कि वे पहले मंदिर का हिस्सा थे और मस्जिद निर्माण के दौरान बेसाल्ट के ऊंचे चबूतरों पर उनका दोबारा उपयोग किया गया। एक स्तंभपर देवी-देवता की आकृति मौजूद है।अपने 242 पृष्ठों के फैसले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), जो 1952 से इस स्मारक का प्रबंधन कर रहा है। उसको परिसर के संरक्षण और आवागमन के नियमन का प्रभार सौंपा। अदालत ने यह भी कहा कि मुसलमानों को अब इस स्थल पर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं होगी और राज्य सरकार को इसके लिए धार जिले में वैकल्पिक भूमि आवंटित करने पर विचार करने का निर्देश दिया। आपको पता है अतीत में हिन्दुओं के धार्मिक स्थानों पर हमला कर कब्जा करना विदेशी आक्रमणकारियों के लिए आम बात थी। उनका लक्ष्य हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना और उन्हें नीचा दिखाना ही था। स्वतंत्रता के पश्चात चाहिए तो यह था कि भारत सरकार स्वयं आगे आकर देश के बहुमत हिन्दू समाज की भावनाओं का आदर करते हुए आक्रमणकारियों द्वारा तोड़े गए धार्मिक व ऐतिहासिक स्थानों को चिन्हित कर उनका पुनरुत्थान करती, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में जो तुष्टिकरण की नीति सत्ताधारियों ने अपनाई उसके कारण समय बीतने के साथ धार्मिक व ऐतिहासिक स्थानों को लेकर देश में तनाव पैदा होने लगा। समस्या यह है कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग अपने आप को विदेशी हमलावरों का वंशज मान हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा होने लगा। परिणामस्वरूप मामले न्यायलयों में जाने लगे। भोजशाला परिसर भी उनमें से एक है। समय की मांग है कि मुस्लिम समाज हिन्दुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए धार्मिक स्थानों के मामले में उदारता दिखाए और विवादों को संवाद द्वारा सुलझाने को प्राथमिकता दे। यह कदम समाज व देश, दोनों के लिए हितकारी होंगे। शनिवार को परिसर के नक्काशीदार पत्थर के स्तंभों पर गेंदे के फूलों की मालाएं लटकी हुई थीं। श्रद्धालु नंगे पैर मेहराबों के नीचे कतार में खड़े होकर पूजा कर रहे थे, तस्वीरें ले रहे थे और काले पत्थर के फर्श पर फूलों की पंखुड़ियां बिखेर रहे थे। उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया और ‘माँ वाग्देवी’ की प्रार्थना की। एक गुप्त कक्ष में काली दीवार पर लगी एक नक्काशी के नीचे फूलों को ‘ओम’ के प्रतीक के रूप में सजाया गया था। हिंदुओं का मानना है कि यहां कभी देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित थी। रविवार को भोजशाल में भव्य पूजा अर्चना का कार्यक्रम चल रहा है। सुबह 6:30 बजे भक्तों ने मां वाग्देवी के चित्र को गर्भग्रह में स्थापित किया। दिनभर हवन-पूजन होगा। धार स्थित भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना शुरू हो गई। धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और एसपी सचिन शर्मा भी पूजा-अर्चना में शामिल हुए। मुस्लिम पक्ष ने कहा है कि वे हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर यह आदेश पहले ही प्रभावी होना शुरू हो गया है। राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इसका समर्थन कर रहे हैं। बहरहाल ऐसे मामलों में दोनों पक्षों को आपसी सद्भाव के साथ थोड़ा दरियादिली दिखाना चाहिए और विवाद को लंबा कानूनी पेचीदगी से बचना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 17 मई 26