लेख
17-May-2026
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(विश्व एड्स वैक्सीन दिवस (18 मई) पर विशेष) पूरी दुनिया में एचआईवी एक खतरनाक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है। एचआईवी मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करता है और उपचार नहीं किए जाने पर एड्स में बदल सकता है। एड्स पहली बार 1981 में अमेरिका में रिपोर्ट किया गया था और देखते ही देखते यह एक विश्वव्यापी महामारी बन गया। एड्स ऐसी स्थिति होती है, जो संक्रमण से लड़ने की शरीर की क्षमता को बेहद कमजोर कर देती है। ऐसे व्यक्ति को तपेदिक, विभिन्न संक्रमण और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार विश्वभर में इस समय चार करोड़ से भी ज्यादा लोग एचआईवी से प्रभावित हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2021 में साढ़े छह लाख लोग एचआईवी से संबंधित कारणों से मारे गए और 15 लाख लोगों को एचआईवी हुआ। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एचआईवी दुनियाभर में 4.01 करोड़ लोगों की मौत का कारण बन चुका है और अभी भी सभी देशों में एचआईवी संचरण देखा जा रहा है तथा कुछ देश तो नए मामलों में वृद्धि भी रिपोर्ट कर रहे हैं। यही कारण है कि एचआईवी को आज भी सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाता है। एचआईवी संक्रमण का हालांकि अभी तक कोई कारगर इलाज नहीं है लेकिन आवश्यक और प्रभावी उपचार तथा देखभाल एचआईवी से पीड़ित लोगों को लंबा और स्वस्थ जीवन जीने में मदद कर सकती है। लाइलाज मानी जाने वाली इस बीमारी के लिए टीका विकसित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालने के लिए 18 मई को ‘विश्व एड्स वैक्सीन दिवस’ मनाया जाता है, जिसे ‘एचआईवी वैक्सीन जागरूकता दिवस’ भी कहा जाता है। वास्तव में यह उन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के काम का सम्मान करने का अवसर है, जो लंबे समय से एचआईवी की रोकथाम के लिए टीका बनाने के लिए प्रयासरत हैं। पहली बार ‘विश्व एड्स वैक्सीन दिवस’ अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के भाषण का सम्मान करते हुए 18 मई 1998 को मनाया गया था। दरअसल बिल क्लिंटन ने 18 मई 1997 को मैरीलैंड में मॉर्गन स्टेट यूनिवर्सिटी में दिए अपने भाषण में इस घातक बीमारी को रोकने और उन्मूलन में टीकाकरण के महत्व पर जोर देते हुए एचआईवी का एक ऐसा टीका विकसित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा था कि एक प्रभावी एचआईवी टीका ही एचआईवी के प्रसार को नियंत्रित करने और उन्मूलन में मदद करेगा और एचआईवी से लड़ने की लोगों की क्षमता में सुधार करेगा। तभी से वैश्विक स्तर पर कई समूहों द्वारा लोगों को एड्स निवारक उपाय करने, एड्स संबंधी शिक्षा का प्रसार करने, शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करने तथा इस कार्य में आम आदमी की पूर्ण भागीदारी का आश्वासन देने के लिए विश्व एड्स वैक्सीन दिवस मनाया जाता है। विभिन्न बीमारियों के उपचार और रोकथाम के लिए टीके मानवता की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धियों में से एक हैं, जो मानव शरीर को वायरस अथवा बैक्टीरिया के कमजोर या निष्क्रिय रूप में उजागर करके अपना काम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को एंटीबॉडी विकसित करने के लिए उत्तेजित करते हैं ताकि शरीर भविष्य के संक्रमण से भी लड़ सके। इसीलिए एक सफल एचआईवी टीका बनाने के लिए भी दुनियाभर के शोधकर्ता प्रयासरत हैं, जिससे वायरस के प्रसार को रोकते हुए लाखों लोगों की जान बचाने में मदद मिल सके। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में एड्स के टीके की खोज की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है लेकिन एक कारगर सार्वभौमिक एचआईवी वैक्सीन की राह में अभी भी काफी चुनौतियां बरकरार हैं। एचआईवी का वर्तमान में कोई सुरक्षित इलाज नहीं है, एक बार जब वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है तो इसे हटाया नहीं जा सकता है लेकिन हाल के वर्षों में जीवन-रक्षक एंटीरेट्रोवायरल उपचारों के आगमन ने लाइलाज मानी जाने वाली एड्स की बीमारी को लेकर स्थिति को काफी बदल दिया है और इन उपचार पद्धतियों से इलाज कराकर लोग अब लंबा तथा स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। एंटीरेट्रोवायरल थैरेपी (एआरटी) प्रतिरक्षा प्रणाली को होने वाले नुकसान को रोक सकती है अथवा उलट सकती है। यदि रोगी एआरटी का पालन करते हैं तो ऐसे अधिकांश मरीज स्वस्थ रहते हैं। फिलहाल व्यापक रूप से तटस्थ एंटीबॉडी (बीएनएबीएस) की खोज भी एचआईवी उपभेदों की विस्तृत श्रृंखला को प्रभावी ढ़ंग से बेअसर करने में अहम भूमिका निभा रही है। इन एंटीबॉडीज ने एक ऐसी सार्वभौमिक एचआईवी वैक्सीन के विकास की आशा को प्रेरित किया है, जो वायरस के खिलाफ व्यापक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। एमआरएनए तथा वायरल वेक्टर प्रौद्योगिकियों जैसे वैक्सीन वितरण प्लेटफार्मों में प्रगति ने भी वैक्सीन विकास प्रयासों को तेज कर दिया है और सफलता की संभावनाएं काफी बढ़ गई है। 1987 में अमेरिका के मैरीलैंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (एनआईएच) में वैज्ञानिकों ने एड्स वैक्सीन पर शोध करना शुरू किया था। इस शोध प्रक्रिया को कोविड-19 वैक्सीन पर हुए शोध ने गति देने में मदद की है। जिस एम-आरएनए तकनीक का इस्तेमाल कोविड वैक्सीन में किया गया, स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के इम्यूनोला/जिस्ट अब उसी तकनीक का उपयोग एड्स वैक्सीन पर भी कर रहे हैं। बहरहाल, एक कारगर सार्वभौमिक एड्स वैक्सीन की खोज का रास्ता लंबा और कठिन भले ही माना जा रहा है लेकिन इस दिशा में अभी तक हुई प्रगति को देखते हुए एड्स वैक्सीन की खोज में आगे आने वाली चुनौतियों के बावजूद तीव्र प्रगति संभव है और वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले दशकों में एड्स मुक्त दुनिया हमारी पहुंच में है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं) ईएमएस / 17 मई 26