भोपाल(ईएमएस)। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 17 मई, 2026 को शांतिलाल कासड़े एवं साथी, बैतूल द्वारा कोरकू जनजातीय ढांढल नृत्य, कार्तिक कुमार नामदेव एवं साथी, नरसिंहपुर द्वारा बरेदी नृत्य, अकांक्षा मिश्रा एवं साथी, छतरपुर द्वारा बुन्देली गायन, प्रमिला मिश्रा एवं साथी, रीवा द्वारा बघेली गायन की प्रस्तुति दी गई। गतिविधि में प्रमिला मिश्रा एवं साथी, रीवा द्वारा बघेली गायन में हमरे अंगना चले आबा हो गउरा के ललनबा (गणेश वंदना)..., मोरे अंगना राजा मोरे अंगना (बधाई गीत)..., अरे चिरई रे सोइगें (सोहाग गीत)..., होत भिनसार बेटी बाजे सहनाई हो की (अंजुरी गीत)..., गारी, बधाई, कलेवा जैसे अन्य गीतों की प्रस्तुति दी। साथ ही अकांक्षा मिश्रा एवं साथी, छतरपुर द्वारा बुन्देली गायन में मोरी मैया विराजो कण में हो मां..., मचलो नंद रानी को छौना..., अपनो ई बुन्देलखंड को है..., गर्जन बरसन लगे बदरा..., सिया जोरे खड़ी दोई हाथ..., जनक राजा रचाई जेवनार..., जैसे अन्य कई पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति दी। ढाँढल नृत्य चौत्र-वैशाख की रातों में किया जाता है। मुद्राओं के आधार पर ढाँढल नृत्य के अलग अलग प्रकार है। वादक घेरे के बाहर होते हैं। नर्तक के हाथ में एक डंडा होता है। डंडे का आघात सामने के घेरे में खड़े नर्तक के डंडे पर होता है। घेरे में खड़े नर्तक गोल-गोल घूमते जाते हैं और डंडे लड़ाते हुए अपने स्थान से छोटे घेरे से बड़े घेरे में बदलते जाते हैं। नृत्य की गति प्रारम्भ में क्षिप्र होती है जो द्रुत में बदल जाती है। नर्तक झींग पर आकर चरम पर समा बाँध देते हैं, नृत्य इसी जगह थम जाता है। नृत्य में ढोल, टिमकी, ढोलक और झाँझ का उपयोग किया जाता है। बुन्देलखण्ड के बरेदी लोकनृत्य का सम्बन्ध हमारे देश की कृषक चरवाहा संस्कृति के साथ है। प्राचीन वाङमय के अध्येताओं ने यह सिद्घ किया कि बहुत पहले इस देश में ‘आभीर्य नामक एक अत्यन्त शक्तिशाली जाति का प्रवेश हुआ था, जो अपने साथ पुराने अपभ्रंश का रूप और आख्यानपरक विशद् लोक कथाएँ लेकर आये थे। कालान्तर में जातियों और संस्कृतियों के आपसी सम्बन्ध के कारण वह पृथक पहचान समाप्त हो गई किन्तु आभीरों की भाषा और संस्कृति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। इन्होंने अपने स्वाभाव, वैशिष्ट्य और रूचि के अनुकूल भारत के महानायक श्री कृष्ण के जीवन और लीला चरित से स्वयं को जोड़ लिया। आज भी उत्तर भारत के अनेक अंचलों में दीपावली के समय यादव लोग नृत्य करते हैं साथ ही गोपाल कृष्ण की लीलाओं विशेषकर किशोर लीलाओं के गीत गाते हैं। बुन्देलखण्ड में बरेदी नृत्य दीपावली से पन्द्रह दिन यानी पूर्णिमा तक चलते हैं। विशेष किन्तु अत्यन्त आकर्षक नृत्य पोषाक के साथ आठ दस युवक और किशोर नर्तक अत्यंत तीव्र गति के साथ नृत्य करते हैं एक व्यक्ति नृत्य के पहिले गीत गाता है। प्रायः दो पंक्तियों की लोक कविता जिसे बुन्देली में ‘दिवारी्य कहा जाता है। यह श्रँगारिक, नीतिपरक, विशेष रूप से धाम्रिक हो सकती है। दीपावली के अवसर पर की जाने वाली गोवर्धन पूजा से इसका घनिष्ठ संबंध है। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार को दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा। हरि प्रसाद पाल /17मई, 2026