19-May-2026
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* 50 बॉक्स से शुरू हुआ सफर आज 2100 बॉक्स तक पहुँचा, हर साल 20 हजार किलो शहद उत्पादन से 10 लाख की शुद्ध आय जामनगर (ईएमएस)| जिले के जोडिया तालुका के प्रगतिशील किसान हरसुख भीमाणी आज गुजरात में ‘मध क्रांति’ के अग्रदूत बन चुके हैं। कभी जामनगर की आयुर्वेद यूनिवर्सिटी में नौकरी करने वाले हर्सुख भीमाणी आज हर साल लगभग 20 हजार किलो शहद का उत्पादन करते हैं और उससे करीब 10 लाख रुपये की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। आयुर्वेद यूनिवर्सिटी से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण हरसुख भीमाणी को यह समझ आ गया था कि शहद धरती का एक ‘सुपर फूड’ है। इसी सोच ने उन्हें मधुमक्खी पालन की ओर प्रेरित किया। इस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा उन्हें महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की एक पुस्तक से मिली। पुस्तक में आइंस्टाइन ने लिखा था - “जिस दिन धरती से मधुमक्खियां समाप्त हो जाएंगी, उसके मात्र चार वर्षों में मानव सभ्यता का भी अंत हो जाएगा।” यह विचार हर्सुख भीमाणी के मन को गहराई से छू गया और उन्होंने मधुमक्खी पालन को अपना जीवन मिशन बना लिया। आगे के अध्ययन में उन्हें पता चला कि प्रकृति ने मधुमक्खियों की रचना केवल शहद उत्पादन के लिए नहीं, बल्कि धरती की 90 प्रतिशत वनस्पतियों में परागण प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए की है। इसी सोच के साथ उन्होंने इस अनजान राह पर कदम बढ़ाया। शुरुआत आसान नहीं थी। ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों में यह डर था कि मधुमक्खियां फसलों के फूलों का रस चूस लेंगी तो उत्पादन घट जाएगा। किसानों के इस भ्रम को दूर करने के लिए गुजरात सरकार का बागवानी विभाग हर्सुख भीमाणी के साथ खड़ा हुआ। अधिकारियों ने किसानों को समझाया कि मधुमक्खियों से उत्पादन घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। सरकार ने उन्हें 50 बॉक्स खरीदने के लिए लगभग 1.25 लाख रुपये की सब्सिडी दी। हर्सुखभाई ने वैज्ञानिक तरीके से यह साबित भी कर दिया कि मधुमक्खियों से फसल अधिक परिपक्व होती है और किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है। उनकी सफलता से प्रभावित होकर राज्य सरकार ने उन्हें आधिकारिक रूप से ‘बी ब्रीडर’ के रूप में पंजीकृत किया और व्यवसाय विस्तार के लिए 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता भी प्रदान की। केवल 50 बॉक्स से शुरू हुआ उनका काम आज 2100 बॉक्स तक पहुंच चुका है। मधुमक्खी प्रबंधन में उनकी विशेषज्ञता के कारण वे जामनगर स्थित अंबानी परिवार के ड्रीम प्रोजेक्ट वंतारा में भी मधुमक्खी प्रबंधन का सहयोग दे रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पूरी तरह अहिंसक तरीके से शहद संग्रह करते हैं। मधुमक्खियों को बिना किसी नुकसान पहुंचाए वैज्ञानिक ढंग से शहद निकाला जाता है। उनकी ब्रांड ‘सन कृपा हनी बी फार्म’ के तहत मिलने वाला शहद 100 प्रतिशत शुद्ध माना जाता है। हरसुख भीमाणी मौसम और फसलों के अनुसार अपने मधुमक्खी बॉक्स अलग-अलग राज्यों में ले जाते हैं। दिसंबर से फरवरी के दौरान जब राजस्थान के भरतपुर और कोटा में सरसों की फसल खिलती है, तब वे अपने बॉक्स वहां पहुंचाते हैं। कई बार वे झारखंड के रांची तक भी मधुमक्खियों को बेहतर वातावरण देने के लिए ले जाते हैं। कुछ वर्षों पहले आए एक चक्रवात में एक ही रात में उनके करीब 300 बॉक्स नष्ट हो गए थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और फिर से मेहनत कर अपने काम को खड़ा कर दिया। हर्सुख भीमाणी कहते हैं, “शहद तो मधुमक्खियों का केवल एक बाय-प्रोडक्ट है। यह छोटा जीव हमें इसके अलावा भी कई अनमोल चीजें देता है।” हरसुख भीमाणी केवल शहद बेचकर ही लाभ नहीं कमाते, बल्कि मधुमक्खी के जहर यानी ‘बी-वेनम थेरेपी’ के जरिए गठिया और जोड़ों के दर्द से पीड़ित मरीजों का निःशुल्क उपचार भी करते हैं। अब तक 700 से अधिक मरीजों को इस उपचार से राहत मिल चुकी है। नए मधुमक्खी पालकों को सलाह देते हुए हर्सुख भीमाणी कहते हैं, “सिर्फ सरकारी सब्सिडी के लालच में इस व्यवसाय में मत आइए। इस अनमोल जीव को बचाने के उद्देश्य से उचित प्रशिक्षण लेकर वैज्ञानिक तरीके से शुरुआत करें।” आज गुजरात सरकार के प्रोत्साहन और हरसुख भीमाणी जैसे दूरदर्शी किसानों के प्रयासों से मधुमक्खी पालन केवल खेती का पूरक व्यवसाय नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ‘मध क्रांति’ का बड़ा जनआंदोलन बन चुका है।