भोपाल(ईएमएस)। एम्स भोपाल लगातार चिकित्सा सेवाओं और शोध कार्यों में नई ऊँचाइयाँ स्थापित कर रहा है, जिससे संस्थान के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। इसी क्रम में पीडियाट्रिक्स विभाग, पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी एवं हाइपरटेंशन डिवीजन के शोधकर्ताओं द्वारा सिकल सेल रोग से पीड़ित बच्चों में छिपी हृदय, नींद और किडनी संबंधी जटिलताओं पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन हाल ही में इंटरनेशनल पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुआ है। यह शोध कार्य एमडी थीसिस के अंतर्गत डॉ. हर्षिता एस. द्वारा डॉ. गिरीश चंद्र भट्ट के मार्गदर्शन में किया गया। अध्ययन के अन्य लेखकों में डॉ. अथिरा पुथुकारा, डॉ. अंबर कुमार, डॉ. अभिषेक गोयल, डॉ. तान्या शर्मा, डॉ. भावना ढींगरा, डॉ. नरेंद्र चौधरी तथा डॉ. शिखा मलिक शामिल हैं। अध्ययन में सिकल सेल रोग से पीड़ित बच्चों में एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर असामान्यताओं, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, प्रारंभिक रक्तवाहिका क्षति और किडनी की कार्यक्षमता का मूल्यांकन किया गया। शोध का विशेष महत्व मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के लिए है, जहां विशेषकर जनजातीय आबादी में सिकल सेल रोग का भार अधिक है। वर्तमान समय में अधिक बच्चे किशोरावस्था और वयस्कता तक जीवित रह रहे हैं, ऐसे में हृदय और किडनी संबंधी जटिलताओं की समय रहते पहचान आवश्यक हो गई है। अध्ययन में 24 घंटे की एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग (ABPM) की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई। कई बच्चों का सामान्य अस्पताल जांच के दौरान रक्तचाप सामान्य पाया गया, लेकिन ABPM के माध्यम से एम्बुलेटरी हाइपरटेंशन, मास्क्ड हाइपरटेंशन, रात के समय उच्च रक्तचाप तथा नींद के दौरान असामान्य ब्लड प्रेशर पैटर्न जैसी समस्याओं का पता चला। लगभग दो-तिहाई बच्चों में रात के समय रक्तचाप का असामान्य व्यवहार पाया गया, जिसे सामान्य जांच से पहचानना संभव नहीं था। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इन बच्चों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) की दर काफी अधिक थी। स्लीप एपनिया वाले बच्चों में हीमोग्लोबिन का स्तर कम पाया गया तथा रक्तवाहिकाओं की क्षति के संकेत अधिक मिले। इन बच्चों में कैरोटिड आर्टरी की मोटाई और लेफ्ट वेंट्रिकुलर मास बढ़ा हुआ पाया गया, जो प्रारंभिक हृदय संबंधी जटिलताओं की ओर संकेत करता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि नींद से जुड़ी श्वसन समस्याओं की गंभीरता एंडोथेलियल डिसफंक्शन से जुड़ी हुई थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि स्लीप एपनिया दीर्घकालिक हृदय क्षति का एक महत्वपूर्ण और नियंत्रित किया जा सकने वाला कारण हो सकता है। अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी था कि कई बच्चों में स्पष्ट हाईपरटेंशन न होने के बावजूद प्रारंभिक अंग क्षति के संकेत मौजूद थे। लगभग 71 प्रतिशत बच्चों में लेफ्ट वेंट्रिकुलर हाइपरट्रॉफी, असामान्य कैरोटिड इंटिमा-मीडिया थिकनेस या एंडोथेलियल डिसफंक्शन जैसे प्रारंभिक हृदय एवं रक्तवाहिका क्षति के संकेत पाए गए। कई बच्चों में सामान्य एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर होने के बावजूद ये असामान्यताएँ देखी गईं, जिससे संकेत मिलता है कि सिकल सेल रोग में रक्तवाहिकाओं की क्षति हाईपरटेंशन से पहले ही शुरू हो सकती है। अध्ययन में प्रारंभिक किडनी जांच के महत्व को भी रेखांकित किया गया। लगभग एक-तिहाई बच्चों में प्रोटीन्यूरिया पाया गया, जो किडनी क्षति का प्रारंभिक संकेत है। इसके अलावा सिस्टेटिन-सी आधारित अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR) जांच से लगभग 61 प्रतिशत बच्चों में किडनी की कार्यक्षमता कम पाई गई, जबकि सामान्य क्रिएटिनिन आधारित जांच में कम बच्चों में असामान्यताएँ सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि प्रोटीन्यूरिया और सिस्टेटिन-सी जैसे संवेदनशील परीक्षण प्रारंभिक अवस्था में ही किडनी क्षति की पहचान में सहायक हो सकते हैं। डॉ. गिरीश चंद्र भट्ट ने कहा कि यह अध्ययन सिकल सेल रोग से पीड़ित बच्चों की देखभाल में समग्र और बहु-विषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि सामान्य रक्त संबंधी उपचार के साथ-साथ एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, स्लीप स्टडी, हृदय जांच, प्रोटीन्यूरिया मूल्यांकन और सिस्टेटिन-सी जैसे संवेदनशील किडनी परीक्षणों के माध्यम से छिपी अंग क्षति की प्रारंभिक पहचान कर बच्चों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया जा सकता है। यह अध्ययन सिकल सेल रोग से जुड़े एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर असामान्यताओं, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, एंडोथेलियल डिसफंक्शन, हृदय संबंधी क्षति और किडनी संबंधी समस्याओं के आपसी संबंधों का एक साथ मूल्यांकन करने वाले भारत के शुरुआती व्यापक अध्ययनों में से एक है। अध्ययन के निष्कर्ष सिकल सेल रोग से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में समय पर जांच और उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। हरि प्रसाद पाल / 21 मई, 2026