लंदन (ईएमएस)। ज्यादातर लोग मानते हैं कि कीड़े केवल जैविक मशीनों की तरह होते हैं और उन्हें दर्द का अहसास नहीं होता। हालांकि अब एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। हाल ही में घरेलू झींगुरों पर की गई एक स्टडी में ऐसे संकेत मिले हैं, जो बताते हैं कि छोटे कीड़े भी दर्द महसूस कर सकते हैं। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने घरेलू झींगुरों यानी हाउस क्रिकेट्स के व्यवहार का बारीकी से निरीक्षण किया। रिसर्च में पाया गया कि जब झींगुर के एंटीना यानी मूंछ पर हल्की गर्मी दी गई, तो उसने केवल झटका देकर प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि इंसानों की तरह अपनी चोट वाली जगह को बार-बार साफ और सहलाया। वैज्ञानिकों के अनुसार यह व्यवहार किसी सामान्य रिफ्लेक्स से कहीं अधिक था। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे इंसान जलने के बाद अपने हाथ को मलते हैं या ठंडे पानी के नीचे रखते हैं, उसी तरह झींगुर भी अपनी तकलीफ कम करने की कोशिश करता दिखाई दिया। यह अध्ययन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि अब तक दर्द महसूस करने की क्षमता मुख्य रूप से इंसानों, स्तनधारियों, पक्षियों और मछलियों तक सीमित मानी जाती थी। अब वैज्ञानिक बिना रीढ़ की हड्डी वाले जीवों यानी इनवर्टिब्रेट्स पर भी गंभीरता से शोध कर रहे हैं। रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने 40 नर और 40 मादा झींगुरों को चुना। इन्हें तीन अलग-अलग समूहों में बांटा गया। पहले समूह के एंटीना पर 65 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला गर्म प्रोब लगाया गया। यह तापमान दर्द पैदा करने के लिए पर्याप्त था, लेकिन इससे स्थायी नुकसान नहीं होता था। दूसरे समूह को बिना गर्म किया गया प्रोब छुआया गया, जबकि तीसरे समूह को बिना किसी स्पर्श के छोड़ दिया गया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने करीब दस मिनट तक उनके व्यवहार की वीडियो रिकॉर्डिंग की। रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले थे। जिन झींगुरों को गर्म प्रोब से छुआ गया था, उन्होंने अपने एंटीना को अन्य झींगुरों की तुलना में दोगुनी बार साफ किया और इस प्रक्रिया में चार गुना ज्यादा समय बिताया। खास बात यह रही कि वे केवल उसी एंटीना को साफ कर रहे थे, जहां गर्मी दी गई थी। यह व्यवहार कई मिनटों तक जारी रहा और दर्द कम होने के साथ धीरे-धीरे कम होता गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि झींगुरों में दर्द महसूस करने वाले रिसेप्टर्स मौजूद होते हैं। वे खतरों से बचना सीख सकते हैं और दर्द निवारक दवाओं से उनके व्यवहार में बदलाव भी देखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह अध्ययन इंसानों को अपनी सोच बदलने के लिए मजबूर करता है। सुदामा/ईएमएस 25 मई 2026