-नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला और भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग को मिली विशिष्ट पहचान पटना,(ईएमएस)। बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक और हस्तशिल्प परंपरा को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों—नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग—को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि को राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों और कलाकारों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पूर्व सीएम नीतीश कुमार खासे खुश हैं। इस अवसर पर राज्यसभा सदस्य नीतीश कुमार ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की प्रामाणिकता और विशिष्ट पहचान को मजबूती मिलेगी। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि यह बिहार की सांस्कृतिक विरासत के लिए गौरव का विषय है और इससे राज्य की पारंपरिक कलाओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। पूर्व मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि पर राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों, कलाकारों और संबंधित संस्थाओं को बधाई देते हुए कहा कि इससे बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक मंच पर और अधिक सम्मान प्राप्त होगा। वहीं, संजय कुमार झा ने भी इस निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जीआई टैग पीढ़ियों से कारीगरों द्वारा संरक्षित कौशल, परंपरा और रचनात्मकता की उचित मान्यता है। उनके अनुसार इससे बिहार के हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों की पहचान मजबूत होगी तथा रोजगार, उद्यमिता और निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी बिहार की प्राचीन बुनकरी परंपरा का अनूठा उदाहरण मानी जाती है। इस कला में कपड़ों पर 52 प्रकार के बौद्ध और सांस्कृतिक प्रतीकों को हाथकरघे पर बुना जाता है। वहीं गया जिले के पत्थरकट्टी गांव की शिल्पकला लगभग तीन शताब्दियों से प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध, भगवान महावीर और अन्य देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं तैयार करते हैं। इसी प्रकार भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग बिहार की पारंपरिक लोक चित्रकला की विशिष्ट शैली है। इसे मुख्य रूप से महिलाएं पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर बनाती हैं। प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से इस कला में ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक परंपराओं का चित्रण किया जाता है। हिदायत/ईएमएस 14जून26