एफसीआई की निगरानी फेल या जानबूझकर किया गया है खेल? जीपीएस बिना कैसे निकले ट्रक? 11 दिन बाद भी ट्रकों के लापता होने का रहस्य बरकरार, बड़ा घोटाला उजागर होने के आसार बालाघाट (ईएमएस). ट्रकों से जीपीएस गायब, सिस्टम फेल या ‘अंदरूनी सेटिंग’, कौन है पीछे का ‘मास्टर माइंड’? एफसीआई गोदाम से एथेनॉल प्लांट के लिए भेजे गए चावल से लदे ट्रकों के गायब होने का मामला अब बड़े घोटाले का संकेत दे रहा है। 11 दिन बाद भी दो ट्रकों का कोई सुराग नहीं लगना और जीपीएस सिस्टम का न होना पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है। पुलिस की जांच में बड़ा घोटाला उजागर होने की संभावना है। इस पूरे प्रकरण में एफसीआई और खाद्य विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों की कार्यप्रणाली कटघरे में है। जानकारी के अनुसार नवेगांव स्थित एफसीआई गोदाम से 3 जून को छिंदवाड़ा के एवीजे एग्रो प्राइवेट लिमिटेड छिंदवाड़ा के एथेनॉल प्लांट के लिए तीन ट्रक सीएमआर (कस्टम मिल्ड राइस) रवाना किए गए थे। लेकिन इस पूरे मामले ने तब सनसनी मचा दी, जब इनमें से एक ट्रक अपने तय गंतव्य तक पहुंचने के बजाय वारासिवनी की संचेती राइस मिल में पकड़ा गया। प्रशासन और खाद्य विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर ट्रक को जब्त किया, जिसमें 247 क्विंटल चावल लोड था। यह खुलासा अपने आप में चौंकाने वाला था, लेकिन असली सवाल तब खड़ा हुआ जब बाकी दो ट्रक रहस्यमय तरीके से गायब हो गए और 11 दिन बाद भी उनका कोई सुराग नहीं मिल सका। इस पूरे मामले में प्रशासन ने संचेती राइस मिल के संचालक सौरभ संचेती, एवीजे एथेनॉल प्लांट के प्रतिनिधि राहुल प्रताप और ट्रक चालक दुर्गेश शेन्द्रे के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया है। जांच के लिए 12 सदस्यीय एसआईटी गठित कर दी गई है, जो पूरे नेटवर्क की परतें खंगाल रही है। क्या यह लापरवाही है या सुनियोजित खेल? नियमानुसार एफसीआई से निकलने वाले हर ट्रक में जीपीएस अनिवार्य होता है, ताकि उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके। लेकिन इन ट्रकों में जीपीएस लगा ही नहीं था। इससे साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं नियमों को जानबूझकर ताक पर रखा गया। सूत्रों के अनुसार, ट्रकों को रवाना करते समय जीपीएस की फिजिकल जांच तक नहीं की गई। ऐसे में एफसीआई के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है। सवाल यह भी उठ रहा है कि बिना जांच के ट्रकों को लोडिंग की अनुमति किसने दी? वहीं खाद्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भी कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आ रही है। एफसीआई के दस्तावेजों की जांच में हो सकते हैं और भी खुलासे विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पिछले कुछ महीनों में एफसीआई से निकले सभी ट्रकों के जीपीएस रिकॉर्ड और एथेनॉल प्लांट के बैंक लेनदेन की जांच की जाए, तो यह मामला सिर्फ दो ट्रकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़े स्तर पर चावल की हेराफेरी का खुलासा हो सकता है। यदि बीते कुछ माह में जितने भी वाहन एफसीआई गोदाम से वारासिवनी और छिंदवाड़ा स्थित एथेनॉल प्लांट गए हैं, उनके जीपीएस चेक किया जाए तो अन्य राइस मिलर्स जो एथेनॉल का चावल उपयोग करते है, उनके खुलासे हो सकते है। साथ ही एथेनॉल कंपनी के बैंक डिटेल्स खंगाले जाएं, तो इससे भी उन राइस मिलर्स और एजेंट के नामों के खुलासे हो सकते है, जिन्हें एफसीआई के चावल एथेनॉल प्लांट के द्वारा बेचे गए है। फिलहाल पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा का कहना है कि लापता ट्रकों की तलाश जारी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी जस का तस है—आखिर चावल से भरे ये ट्रक गए कहां ? और इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड कौन है? जब जीपीएस अनिवार्य तो कहां दोनों ट्रक? जानकार बताते है कि सीएमआर चावल लेकर जितने भी ट्रक एफसीआई गोदाम से निकलते है, उन सभी ट्रकों में जीपीएस होना अनिवार्य होता है। ऐसे में यहां यह सवाल उठता है कि जब दोनों ट्रकों में जीपीएस लगे थे, तो वह लापता कैसे हो गए? हालांकि, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये दोनों ट्रक बालाघाट में सत्ताधारी दल के एक बड़े नेता की राइस मिल में खाली हो गए, इसके बाद उन ट्रकों को गायब कर दिया गया। ट्रकों में जीपीएस लगा नहीं होने के चलते पुलिस उन्हें ट्रेक नहीं कर पा रही है। बंद कमरे में ‘जांच पर ब्रेक’ की मांग, मंत्री ने किया साफ इनकार चावल घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सियासी हलचल भी तेज हो गई है। अब इस मामले में जांच को प्रभावित करने के प्रयास सामने आने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, चावल घोटाले की जांच को रोकने के लिए अब राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। 13 जून को जिले के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह के बालाघाट प्रवास के दौरान यह मुद्दा अंदरखाने गर्म रहा। बताया जा रहा है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं ने बंद कमरे में प्रभारी मंत्री से मुलाकात कर इस मामले की जांच पर ब्रेक लगाने की गुहार लगाई। हालांकि, प्रभारी मंत्री ने साफ शब्दों में इस मांग को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा अपने दायित्वों का निर्वहन बेहतर तरीके से कर रहे हैं और किसी भी जांच को रोकना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। मंत्री के इस रुख के बाद उन नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया, जो इस मामले को दबाने की कोशिश में लगे थे। सूत्रों की मानें तो यह घोटाला अब केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी आंच सत्ताधारी गलियारों तक पहुंचने लगी है। चर्चा यह भी है कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। यही कारण है कि अब इस प्रकरण को लेकर पर्दे के पीछे गतिविधियां तेज हो गई हैं। फिलहाल, प्रशासन और पुलिस अपनी जांच में जुटी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दबाव की राजनीति जांच की दिशा बदल पाएगी या सच्चाई सामने आएगी? भानेश साकुरे / 14 जून 2026