लंदन (ईएमएस)। साल 1993 से 2010 के बीच इंसानों ने जमीन के नीचे से करीब 2150 गीगाटन पानी पंप करके बाहर निकाल लिया। यह पानी इतना अधिक था कि इससे समुद्र का जलस्तर लगभग 6.24 मिलीमीटर तक बढ़ गया। यह कहना है सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के मशहूर भू-वैज्ञानिक की-वियोन सेओ का। रिसर्च कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि पानी में अपना एक भारी वजन होता है। जब यह पानी जमीन के नीचे बने कुदरती एक्विफर्स में जमा था, तब तक धरती का संतुलन बिल्कुल परफेक्ट था। लेकिन इंसानों ने खेती की सिंचाई करने और अपनी बेहिसाब जरूरतों को पूरा करने के लिए इस पानी को खींचकर शहरों और खेतों में बहा दिया, जहां से यह आखिरकार समुद्र में जा मिला। नासा के वैज्ञानिकों ने इसे यांत्रिक भाषा में समझाते हुए कहा कि यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी घूमते हुए लट्टू के एक हिस्से पर थोड़ा सा वजन बढ़ा दें या वहां से वजन हटा दें, तो वह लट्टू अजीब तरीके से डगमगाने लगता है। ठीक इसी तरह, जमीन से पानी निकालकर समुद्र में भेजने से पूरी पृथ्वी का संतुलन बिगड़ गया और उसका घूर्णन ध्रुव 31.5 इंच खिसक गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, हमारी पृथ्वी उसकी धुरी से तब सबसे भयावह तरीके से डिगती है, जब धरती के बीच वाले हिस्से (मध्य अक्षांश) में आने वाले देशों से पानी खींचा जाए। ऐसे हालातों में उसका सीधा और सबसे घातक असर पृथ्वी के घूमने की रफ्तार और उसके संतुलन पर पड़ता है। यह केवल धुरी खिसकने का ही मामला नहीं है, बल्कि इसके जो परिणाम अब सामने आने लगे हैं, वे बेहद भयावह हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के 40 सबसे बड़े नदी डेल्टा, जहां घनी आबादी रहती है, बहुत तेजी से नीचे की तरफ धंस रहे हैं। जमीन के नीचे से पानी का सपोर्ट खत्म होने की वजह से जमीन खोखली होकर नीचे की तरफ दब रही है। इससे भी बड़ा खतरा ‘नेचर वॉटर’ की एक नवीनतम वैश्विक तटीय रिपोर्ट में सामने आया है। दुनिया के 21 फीसदी तटीय इलाकों में भूजल का स्तर डराने वाली तेजी से नीचे गिरा है। इसके चलते तटीय इलाकों के कुदरती वॉटर टैंक में अब समुद्र का खारा और जहरीला पानी घुसने लगा है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में करोड़ों लोगों के पीने का पानी कड़वा और जहरीला हो जाएगा। इसके अलावा, धरती की परतों में आ रहे इस असंतुलन की वजह से भयानक भूकंप, भयंकर सूखा और बेमौसम तबाही मचाने वाली बाढ़ जैसी महाप्रलय का खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिकों के लिए भी पृथ्वी का यह डगमगाना एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के रिसर्च साइंटिस्ट सुरेंद्र अधिकारी का कहना है कि धुरी के खिसकने में केवल भूजल ही नहीं, बल्कि बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव, ग्रीनलैंड की बर्फ का पिघलना और पृथ्वी के अंदरूनी हिस्सों में होने वाली हलचलें भी शामिल हैं। साल 2026 में वैज्ञानिकों ने ‘टीडब्ल्यूस्टोर’ और ‘एमएल-टीडब्ल्यूआईएक्स’ जैसी नई तकनीकों के जरिए पिछले चार दशकों के पानी के डेटा का दोबारा विश्लेषण किया है, लेकिन फिर भी इस डरावने सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि इंसानों द्वारा निकाला गया पानी इस तबाही का सबसे बड़ा और मुख्य कारण है। इस भयानक अंधेरे के बीच ‘साइंस’ मैगजीन की एक हालिया समीक्षा में थोड़ी सी उम्मीद की किरण दिखाई दी है। वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 67 ऐसे मामलों का अध्ययन किया जहां इंसानों ने सही नीतियां बनाईं, कृत्रिम तरीके से जमीन के नीचे पानी को दोबारा भरा और पानी के दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल किया। नतीजा यह हुआ कि वहां के सूखे एक्विफर्स दोबारा पानी से भर गए और जमीन का धंसना रुक गया। लेकिन मुश्किल यह है कि यह फॉर्मूला हर जगह आसानी से लागू नहीं किया जा सकता। अगर इंसानों ने तुरंत अपनी आदतों को नहीं बदला, पानी की बर्बादी नहीं रोकी और पाताल को इस तरह खोखला करना बंद नहीं किया, तो धरती की धुरी का यह झुकाव आने वाले समय में मानव सभ्यता के विनाश का अंतिम चैप्टर लिख देगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी का अपनी धुरी से झुकना और डगमगाना कोई मामूली बात नहीं है; इसके कारण आने वाले दिनों में भयंकर गर्मी, अचानक आने वाले विनाशकारी भूकंप, समुद्र का जलस्तर बढ़ने से भयंकर बाढ़ जैसी महाप्रलय आ सकती है, जिसे मानव सभ्यता झेल नहीं पाएगी। सुदामा/ईएमएस 15 जून 2026