नई दिल्ली (ईएमएस)। भारतीय टेक सेक्टर में काम करने वाले एक सॉफ्टवेयर डेवलपर के वायरल दावे ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। पोस्ट में कहा गया है कि अमेरिका की कई कंपनियां भारतीय इंजीनियरों और डेवलपर्स को समान काम के बावजूद स्थानीय (लोकल) कर्मचारियों की तुलना में काफी कम वेतन देती हैं। इस बयान के बाद “क्या रिमोट वर्क भारतीयों के लिए फायदेमंद है या सिर्फ सस्ता श्रम?” जैसे सवालों पर बहस तेज हो गई है। वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि भारतीय डेवलपर्स को अक्सर लगभग 25–40 लाख रुपये सालाना के पैकेज पर काम पर रखा जाता है, जबकि वही प्रोफाइल वाले अमेरिकी इंजीनियरों को कई गुना ज्यादा सैलरी मिलती है। इस तर्क को लेकर सोशल मीडिया पर दो धड़े बन गए हैं—एक इसे “ग्लोबल लेबर मार्केट का सामान्य नियम” बता रहा है, जबकि दूसरा इसे “वेतन असमानता और आउटसोर्सिंग का शोषण मॉडल” कह रहा है। कई टेक प्रोफेशनल्स का कहना है कि कंपनियां “कॉस्ट आर्बिट्रेज” यानी लागत के आधार पर अलग-अलग देशों में अलग वेतन तय करती हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका में जीवन-यापन की लागत अधिक है, इसलिए वहां के वेतन भी उसी अनुपात में ज्यादा होते हैं। वहीं भारत में कंपनियां स्थानीय बाजार के हिसाब से पैकेज तय करती हैं। दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि जब काम और स्किल समान हैं, तो वेतन में इतना बड़ा अंतर उचित नहीं है। कुछ लोग इसे “cheap labour model” बताते हैं, जिसमें कंपनियां वैश्विक स्तर पर काम तो कराती हैं, लेकिन भुगतान स्थान के आधार पर करती हैं, न कि कौशल के आधार पर। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस नई नहीं है। आउटसोर्सिंग और रिमोट वर्क मॉडल पिछले दो दशकों से इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमता रहा है कि क्या “समान काम के लिए समान वेतन” संभव है या यह पूरी तरह बाजार की मांग और सप्लाई पर निर्भर रहेगा। सुबोध/१५ -०६-२०२६