राष्ट्रीय
24-Jan-2026
...


नई दिल्ली (ईएमएस)। सनातन परंपरा में मौन व्रत को सर्वोच्च तप माना गया है। 18 जनवरी यानि आज के दिन मौनी अमावस्या पर मौन व्रत का विशेष महत्व है, जो धार्मिक आस्था के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। मौन केवल बोलना बंद कर देना नहीं है, बल्कि यह पूरी चेतना और सजगता के साथ अपनाई जाने वाली एक आंतरिक साधना है। यह व्यक्ति को बाहरी अशांति से दूर कर अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। सदियों से आध्यात्मिक परंपराओं में मौन को आत्मबोध, आंतरिक स्वतंत्रता और सच्चे आनंद का मार्ग माना गया है। जब व्यक्ति मौन धारण करता है, तो उसकी ऊर्जा व्यर्थ नहीं होती और मन स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है। आयुर्वेद में भी मौन को मन की शांति, संयम और ऊर्जा संरक्षण से जोड़ा गया है। आयुर्वेद के अनुसार, अत्यधिक बोलना वात दोष को बढ़ाता है, जिससे बेचैनी, तनाव, अनिद्रा और मानसिक अस्थिरता उत्पन्न होती है। मौन रहने से वात दोष संतुलित होता है, सत्व गुण में वृद्धि होती है और व्यक्ति अधिक स्थिर, संतुलित और जागरूक महसूस करता है। इससे एकाग्रता बढ़ती है, क्रोध पर नियंत्रण होता है और हृदय तथा ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याओं में भी सुधार देखा जाता है। भगवद्गीता में मौन को गुह्य ज्ञान कहा गया है और इसे मानसिक तप का स्वरूप माना गया है। गीता के अनुसार, वाणी पर संयम रखने से ओजस की रक्षा होती है, जिससे शरीर और मन दोनों सशक्त बनते हैं। मौन व्यक्ति को आत्मसंयम सिखाता है और आंतरिक शक्ति को बढ़ाता है। आधुनिक शोध भी मौन के लाभों की पुष्टि करते हैं। कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि शोर प्रदूषण मानसिक तनाव को बढ़ाने के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। वहीं, नियमित रूप से मौन का अभ्यास करने से मस्तिष्क पर सकारात्मक और उपचारात्मक प्रभाव पड़ता है। एक शोध में पाया गया कि रोजाना कुछ समय मौन में बिताने से मस्तिष्क कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा मिलता है, जिससे स्मरण शक्ति, सीखने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। मौन तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को कम करता है, हृदय गति और रक्तचाप को संतुलित रखता है, नींद की गुणवत्ता सुधारता है और रचनात्मकता को बढ़ाता है। यह ध्यान के समान प्रभाव डालता है और मस्तिष्क के लिए एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है। ऐसे में मौनी अमावस्या पर मौन व्रत न केवल आध्यात्मिक साधना है, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। मालूम हो कि आज की तेज रफ्तार और शोर-शराबे से भरी जिंदगी में शांति मानो विलुप्त होती जा रही है। लगातार बढ़ती भागदौड़, तनाव और ध्वनि प्रदूषण ने न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है, बल्कि मानसिक संतुलन भी बिगाड़ दिया है। ऐसे वातावरण में मौन का अभ्यास एक सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी उपाय बनकर सामने आता है। सुदामा/ईएमएस 24 जनवरी 2026