लेख
24-Jan-2026
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25 जनवरी का दिन अपने आप में अत्यंत गौरवपूर्ण, महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। दरअसल, इसी दिन वर्ष 1950 में भारत ने अपने राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ के सिंह शीर्ष को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था। यह निर्णय केवल एक प्रतीक के चयन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह संवैधानिक भारत की पहचान और उसके मूल्यों की औपचारिक घोषणा थी। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यह महसूस किया गया कि नवस्वतंत्र भारत का एक ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक होना चाहिए, जो भारत की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, संवैधानिक आदर्शों तथा राष्ट्रीय आत्मा को प्रतिबिंबित कर सके। इसी उद्देश्य से मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ को आधार बनाया गया, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की एक अनुपम और अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर है। यदि हम अशोक स्तंभ के सिंह शीर्ष की बात करें, तो इसके शीर्ष पर चार सिंह पीठ से पीठ सटाए हुए खड़े हैं, जो चारों दिशाओं की ओर दृष्टि रखते हैं। इसके नीचे स्थित गोलाकार अबेकस (मंडल) पर क्रमशः सिंह, घोड़ा, बैल (सांड), हाथी तथा बीच में अशोक चक्र है। ये सभी प्रतीक शक्ति, साहस, सतर्कता, नैतिकता और धर्म के संदेशवाहक हैं। प्रतीकात्मक दृष्टि से हाथी गर्भ, बैल राशि, घोड़ा गृहत्याग, तथा सिंह ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। सारनाथ का अशोक स्तंभ चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसकी ऊँचाई लगभग 45 फीट है। यह स्तंभ एकाश्म शैली में बनाया गया है, अर्थात् इसे एक ही पत्थर को तराशकर तैयार किया गया है, जो इसकी तकनीकी उत्कृष्टता को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि सारनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) वही स्थान है, जहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। सम्राट अशोक ने ऐसे ही स्तंभों की स्थापना बौद्ध धर्म के प्रसार हेतु प्रमुख स्थानों पर करवाई थी। राष्ट्रीय प्रतीक में प्रदर्शित अशोक चक्र 32 तीलियों से युक्त है, जिसके दाईं ओर एक सांड और बाईं ओर एक घोड़ा अंकित है। प्रतीक के ठीक नीचे अंकित वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ का अर्थ है- सत्य की ही विजय होती है। यह वाक्य मुण्डक उपनिषद से लिया गया है और भारत के शासन, लोकतंत्र तथा संवैधानिक व्यवस्था की नैतिक आधारशिला को दर्शाता है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि भारत का शासन सत्य, न्याय और धर्म पर आधारित होगा। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि 25 जनवरी 1950 को ही इस राष्ट्रीय चिह्न को आधिकारिक स्वीकृति क्यों दी गई? इसका सीधा और सटीक उत्तर यह है कि 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था, और उससे ठीक एक दिन पहले राष्ट्र को उसके आधिकारिक प्रतीक से सुसज्जित किया गया। इस प्रकार, यह निर्णय संवैधानिक भारत की पहचान की औपचारिक घोषणा के रूप में देखा जा सकता है। राष्ट्रीय प्रतीक के डिज़ाइन और रूपांतरण की बात करें, तो मूल अशोक स्तंभ में जहाँ चार सिंह हैं, वहीं राष्ट्रीय प्रतीक में सामने दिखाई देने वाले केवल तीन सिंह दर्शाए गए हैं। यह डिज़ाइन महान कलाकार नंदलाल बोस के निर्देशन में तैयार किया गया था। नंदलाल बोस का जन्म 3 दिसंबर 1882 को खड़गपुर (तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी) में हुआ था। वे भारतीय कला पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभों में से एक थे और उन्होंने भारतीय कला को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त कर स्वदेशी पहचान प्रदान की। समकालीन संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वर्ष 2022 में नए संसद भवन के शीर्ष पर अशोक स्तंभ की एक विशाल कांस्य प्रतिकृति स्थापित की गई। इसका अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 11 जुलाई 2022 को किया गया। यह कांस्य स्तंभ लगभग 20 फीट ऊँचा, 11–14 फीट चौड़ा तथा 9500 किलोग्राम वजनी है। जानकारी के अनुसार, नए संसद भवन पर स्थापित यह प्रतिकृति मूल अशोक स्तंभ की तुलना में लगभग चार गुना बड़ी है और इसका साँचा लगभग 1.6 मीटर ऊँचा बनाया गया। आज राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ का उपयोग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, भारतीय मुद्रा, पासपोर्ट, सरकारी दस्तावेज़ों, अधिसूचनाओं तथा विभिन्न सरकारी भवनों पर भारत की संप्रभुता और अधिकार के प्रतीक के रूप में किया जाता है। चूँकि यह केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि संवैधानिक महत्व का राष्ट्रीय चिह्न है, इसलिए इसके उपयोग को लेकर स्पष्ट नियम-कानून निर्धारित किए गए हैं। राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग केवल संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों-जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उच्च अधिकारियों-द्वारा ही किया जा सकता है। किसी भी निजी व्यक्ति या संस्था द्वारा इसके उपयोग पर प्रतिबंध है। इसके दुरुपयोग को रोकने हेतु ‘राष्ट्रीय चिन्ह (दुरुपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 2005’ लागू किया गया है। ईएमएस/24/01/2026