राष्ट्रीय
17-Feb-2026


नई दिल्ली,(ईएमएस)। आज के दौर में हम एक बटन दबाते ही दुनिया के किसी भी कोने में ई-मेल या संदेश भेज सकते हैं, लेकिन एक दौर था जब चिट्ठियों को भी आसमान के रास्ते भेजने की कल्पना करना भी जादू लगता था। हालांकि, सपने को हकीकत में बदलने का गौरव भारत की पावन धरती प्रयागराज को हासिल है। आज से 114 साल पहले, कुंभ मेला के दौरान ही दुनिया की पहली आधिकारिक एयर मेल सेवा की शुरुआत हुई थी। यह कहानी शुरू होती है 18 फरवरी 1911 की शाम से। जब प्रयागराज में यमुना किनारे यूपी एग्जीबिशन का आयोजन हो रहा था। शाम के करीब 5:30 बजे थे और वहां करीब एक लाख लोगों की भारी भीड़ जमा थी। उस जमाने में हवाई जहाज लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था, इसलिए हर कोई इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनना चाहता था। फ्रांसीसी पायलट मोंसियर हेनरी पेक्वेट ने अपने विमान में 6,500 पत्रों से भरा एक मेल बैग रखा और प्रयागराज से नैनी की ओर उड़ान भरी। यह महज एक उड़ान नहीं थी, बल्कि संचार के क्षेत्र में एक वैश्विक क्रांति की शुरुआत थी। पायलट पेक्वेट ने प्रयागराज से नैनी तक की करीब 15 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 13 मिनट में तय किया। विमान ने सफलतापूर्वक नैनी जंक्शन के पास लैंडिंग की। इस मेल बैग पर पहला एयर मेल और यूपी एग्जीबिशन, इलाहाबाद अंकित किया गया था। इस छोटी सी उड़ान ने भारत का नाम दुनिया के डाक इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज कर दिया। इस खास हवाई डाक सेवा का हिस्सा बनने के लिए उस समय छह आना शुल्क तय किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि वजन की सीमा होने के कारण केवल 6,500 चिट्ठियां ही पहले बैग में शामिल किए जा सके थे। इस ऐतिहासिक सेवा से जो भी आय हासिल हुई, उसे ऑक्सफोर्ड-कैंब्रिज हॉस्टल को दान कर दिया गया था। भारत का गौरवशाली मील का पत्थर प्रयागराज की यह उपलब्धि आज भी दुनिया भर के डाक और विमानन इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है। यह उड़ान न केवल भारत की पहली एयर मेल थी, बल्कि इसने पूरे दुनिया को डाक पहुंचाने का एक नया और तेज रास्ता दिखाया था। आशीष दुबे / 17 फरवरी 2026