नई दिल्ली (ईएमएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नौकरी छूटना या वित्तीय विवाद पति को भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं करते, यदि उसके पास पर्याप्त आय क्षमता थी। कोर्ट ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद किया, जिसमें भरण-पोषण जनवरी 2019 से देने का निर्देश था। दिल्ली हाई कोर्ट ने मना है कि नौकरी छूटना, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, ऋण या अन्य देनदारियों जैसी वित्तीय कठिनाइयों को उस अवधि के लिए भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, जिस दौरान पति के पास पर्याप्त आय क्षमता थी। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने माना कि वित्तीय लेन-देन संबंधित विवाद भी पति को अपने आश्रितों के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं करते हैं। अदालत ने यह टिप्पणी एक पत्नी और उसकी दो बेटियों की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। महिला ने याचिका में पारिवारिक कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण याचिका दायर करने की तारीख से अंतरिम भरण-पोषण का भुगतान केवल जनवरी 2019 से करने का निर्देश दिया गया था, जबकि दोनों 2016 में अलग हुए थे। कोर्ट ने सभी तथ्यों को देखते हुए महिला को 2016 से भरण पोषण देने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता महिला व व्यक्ति की शादी 2001 में हुई थी और शादी से उनकी दो बेटियां थीं। दोनों आपसी झगड़ों के बाद अलग-अलग रहने लगे। 2016 में, पत्नी ने आवेदन दाखिल कर अपने और दो नाबालिग बेटियों के लिए भरण-पोषण देने की मांग की। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/16/मार्च/2026