केंद्रीय चुनाव आयोग ने 15 मार्च रविवार को पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा कर दी। देश में पहली बार मात्र 21 दिनों में मतदान की प्रक्रिया पूरी होगी। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कराने की अभी तक की जो प्रक्रिया थी। उसमें मनमाने तरीके से बदलाव करते हुए जिस तरीके से पांच राज्यों के चुनाव घोषित किए हैं। उसके कई अन्य मायने भी माने जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सरकार ने एक ही तीर से कई निशाने साधे हैं? चुनाव आयोग के इस निर्णय पर यह कहा जा सकता है, संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी और नैतिकता को भूल चुकी हैं? वह सरकार के इशारे पर ही काम कर रहीं हैं। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा न्यायपालिका की हो रही है। केंद्रीय चुनाव आयोग ने पहली बार 9 से 29 अप्रैल के बीच मात्र 21 दिनों में नामांकन से लेकर मतदान तक की प्रक्रिया पूर्ण कराने का रिकॉर्ड बनाया है। संसद का बजट सत्र चल रहा है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है। संसद में इसके बारे में चर्चा होनी थी। सांसद एवं विधायक इसी बीच चुनाव घोषित कर दिए गए। चुनाव घोषित होने का प्रभाव यह होगा की सभी राजनीतिक दल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पांडिचेरी के चुनाव में व्यस्त हो जाएंगे। संसद में सांसदों की उपस्थिति और सक्रियता बहुत कम हो जाएगी। ऐसी स्थिति में चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रस्ताव पेश किया गया है, उस पर भी शायद चर्चा हो पाए। शायद इसी रणनीति को ध्यान में रखते हुए रविवार के दिन चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची अभी तक जारी नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर न्यायपालिका के जज एसआईआर मैं मतदाताओं के नाम जोड़ने के विवाद में सतत जाँच कर रहे हैं। लाखों मतदाताओं के नामों को लेकर जो जाँच चल रही है। वह कब तक पूरी होगी, इसका कोई भरोसा नहीं है। इसके बाद भी चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के चुनाव भी घोषित कर दिए। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले से एसआईआर का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अभी तक इसकी संवैधानिकता के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया है। लगभग 1 साल से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। जिसमें तारीख पर तारीख मिल रही है। इसी बीच चुनाव भी होते चले जा रहे हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची की जाँच में पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों के जजों को लगा दिया गया है। अभी तक मतदाता सूची फाइनल नहीं हुई, उसके बाद भी चुनाव घोषित कर दिए गए। संसद में इस बार एपस्टीन फाइल मे शामिल राजनेताओं के नाम, भारत की विदेश नीति, अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के युद्ध की स्थिति में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी संकट को लेकर विपक्ष संसद में जो दबाव सरकार पर बना रहा था। चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों के चुनाव घोषित किए जाने के बाद यह सब मामले ठंडा बस्ते में चले गए हैं। भारत के शेयर बाजार लगातार गिरावट है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिर रही है। देश में आर्थिक संकट और वैश्विक मंदी को लेकर बजट सत्र में जो चर्चा होनी थी। अब वह शायद नहीं होगी। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने राज्य के चुनाव में सक्रिय हो जाएंगे। इसका फायदा सत्ता पक्ष को मिलता हुआ दिख रहा है। बजट सत्र के दौरान, सरकार को जो चुनौतियां मिल रही थी। उन चुनौतियों से एक ही झटके में सरकार को मुक्ति मिल गई। विपक्ष सरकार के खिलाफ जो जाल फैला रहा था, अब सरकार के बिछाए हुए जाल में फंसकर विपक्ष को फड़फड़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शीर्ष नेतृत्व जिस तरह से अपनी रणनीति बनाता है। विपक्ष चाह कर भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा है। विपक्ष आपस में लड़ रहा है, इसका फायदा उठाते हुए भाजपा तमाम चुनौतियों के बाद भी सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। इस पूरे घटना चक्र में चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका, सरकार के पक्ष में होने के कारण लोगों का इन दोनों संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। कुछ इसी तरीके की स्थिति बांग्लादेश में शेख हसीना के चुनाव में देखने को मिली थी। बांग्लादेश के चुनाव आयोग द्वारा जिस तरह से सरकार की मदद चुनाव में की थी। बांग्लादेश की न्यायपालिका ने भी सरकार का साथ दिया था। जिसके कारण बांग्लादेश में विद्रोह देखने को मिला। भारत में केंद्रीय चुनाव आयोग को हटाने के लिए विपक्ष संसद में प्रस्ताव पेश किया गया था। संसद मे कार्यवाही शरू होती, उसके पहले ही पांच राज्यों के चुनाव घोषित कर चुनाव आयोग ने यह बता दिया है, उसे सरकार का समर्थन है। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का प्रकाशन हुए बिना चुनाव घोषित किए गए हैं। इसका मतलब है, चुनाव आयोग को भरोसा है, कि सुप्रीम कोर्ट इसकी अधिसूचना को मान्य करेगी। चुनाव आयोग को सरकार पर भरोसा है। वर्तमान स्थिति में पांच राज्यों के चुनाव होने पर उसे कहीं से चुनौती मिलने वाली नहीं है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका की चर्चा बड़े पैमाने पर देश में हो रही है। चुनाव आयोग ने देर रात मुख्य सचिव डीजीपी सहित अन्य अधिकारियों के ट्रांसपर कर दिये। सोमवार को संसद में टीमसी सांसदों ने आपत्ति दर्ज कराते हुए सदन से बिहष्कार किया है। सरकार जो चाहती हैं वह केंद्रीय चुनाव आयोग कहता है। उसके निर्णयों के खिलाफ जब मामला अदालत में जाता है। उस पर तारीख पर तारीख देकर मामलों को लंबित रखने का फायदा सरकार और चुनाव आयोग को मिलता है। अब यह चर्चा जनमानस के बीच में होने लगी है। इसे लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक व्यवस्था में अच्छा नहीं संकेत माना जा सकता है। ईएमएस / 16 मार्च 26