लेख
09-Apr-2026
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(विशेष लेख : 10 अप्रैल विश्व होम्योपैथी दिवस) आज के दौर में जब हम सुबह उठते हैं, तो हमारा सामना प्रदूषण, मिलावट और तनाव से होता है। ऐसे में बीमारियां हमारे जीवन का हिस्सा बन गई हैं। आज दुनिया में चिकित्सा की कई पद्धतियां हैं, लेकिन डब्ल्यूएचओ के कुछ आंकड़े हमें चौंकाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, होम्योपैथी आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा पद्धति बन चुकी है। पूरी दुनिया में इसकी लोकप्रियता हर साल करीब 20 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है। अकेले हमारे देश भारत की बात करें, तो यहाँ लगभग 10 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी छोटी-बड़ी बीमारियों के लिए पूरी तरह होम्योपैथी पर भरोसा करते हैं। यह भरोसा यूँ ही नहीं बना है, इसके पीछे इस पद्धति की सादगी और बिना किसी नुकसान के ठीक करने की ताकत छिपी है। अक्सर शरीर के अनजाने रोगों के लिए लोग सालों-साल इलाज कराते हैं। लाखों रुपए अस्पतालों और जांचों में खर्च कर देते हैं परिणाम के नाम सिर्फ चंद घंटों की राहत मिलती है। ऐसे में होम्योपैथी सस्ता और पक्का विकल्प बनकर सामने आती है। आयुष मंत्रालय की मानें तो होम्योपैथी का इलाज अन्य पद्धतियों के मुकाबले काफी किफायती है, जो भारत के हर आम और गरीब आदमी की पहुँच में है। लेकिन इसका सस्ता होना इसकी कमजोरी नहीं, बल्कि इसकी खूबी है। यह शरीर को रसायनों की भट्टी बनाने के बजाय उसे अंदर से मजबूत बनाने का काम करती है। होम्योपैथी के बारे में एक बात बहुत मशहूर है कि यह असर दिखाने में बहुत वक्त लेती है। लोग अक्सर कहते हैं कि यह बहुत धीमी है। लेकिन हकीकत यह है कि यह धीमी नहीं बल्कि गहरी है। जब कोई बीमारी पुरानी हो जाती है, तो वह शरीर की जड़ों में बैठ जाती है। उस जड़ तक पहुँचने में दवा को थोड़ा समय तो लगता ही है। कई बार ऐसा देखा गया है कि इलाज शुरू करने के पहले पंद्रह दिनों तक मरीज को कोई खास फर्क महसूस नहीं होता। मरीज को लगता है कि शायद ये गोलियां काम नहीं कर रही हैं। लेकिन असल में वह पंद्रह दिन का समय शरीर के अंदर की सफाई और मरम्मत का होता है। जैसे ही वह आधार तैयार होता है, पंद्रह दिन बाद अचानक बीमारी ऐसे गायब होने लगती है जैसे कभी थी ही नहीं। आजकल एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होना एक बड़ी वैश्विक चिंता बन गया है। ऐसे में होम्योपैथी एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 30 प्रतिशत लोग अब पुरानी बीमारियों के लिए सबसे पहले होम्योपैथी का चुनाव कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इन दवाओं का लीवर, किडनी या पेट पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। यही वजह है कि आज कई बड़े एलोपैथी डॉक्टर भी दबी जुबान में मानने लगे हैं कि जहाँ आधुनिक विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं, वहाँ होम्योपैथी का अनुभव और असर कमाल कर जाता है। प्रतिवर्ष 10 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व होम्योपैथी दिवस दरअसल इस पद्धति के जनक डॉ. सैमुअल हैनीमैन के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन है। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि मरीज का इलाज करते समय केवल उसके अंगों को नहीं, बल्कि उसके पूरे व्यक्तित्व को देखना चाहिए। होम्योपैथी में दवा देते समय डॉक्टर केवल आपकी बीमारी नहीं पूछते, बल्कि आपकी पसंद-नापसंद और आपके स्वभाव को भी समझते है। क्योंकि विज्ञान मानता है कि हर इंसान की बनावट और उसकी तकलीफ अलग होती है, इसलिए उसका इलाज भी अलग और विशेष होना चाहिए। भारत में अब 2 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड होम्योपैथी डॉक्टर दिन-रात लोगों की सेवा में जुटे हैं। सरकार ने भी इसे नेशनल हेल्थ मिशन का हिस्सा बनाकर इसकी ताकत को पहचाना है। यह पद्धति हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य कोई ऐसी चीज नहीं जिसे आप दुकान से खरीद लें, यह तो एक संतुलन है जो कुदरत के करीब रहने से मिलता है। आज के महंगाई के दौर में, जब एक मामूली बीमारी भी घर का बजट बिगाड़ देती है, तब होम्योपैथी एक राहत भरी सांस की तरह लगती है। यह न केवल शरीर को ठीक करती है, बल्कि मरीज के मन से उस बीमारी का डर भी निकाल देती है। अंत में, बस इतना ही कहना काफी होगा कि आरोग्य का रास्ता हमेशा कड़वा या महंगा हो, यह जरूरी नहीं है। कभी-कभी मीठी गोलियों का छोटा सा सफर भी बड़े-बड़े रोगों को मात दे सकता है। जरूरत है तो बस थोड़े से धैर्य की और अपनी कुदरती ताकत पर विश्वास रखने की। यदि हम होम्योपैथी को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, तो हम न केवल बीमारियों से बचेंगे बल्कि एक खुशहाल और दुष्प्रभाव मुक्त जीवन जी पाएंगे। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 09 अप्रैल 26