लेख
09-Apr-2026
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महापंडित राहुल सांकृत्यायन...एक ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने 20वीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व पटल पर पुनर्जीवित किया। 09 अप्रैल को उनका जन्म हुआ था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1896-1963) न केवल एक अथक यात्री थे, बल्कि एक विपुल लेखक भी थे जिन्होने 13 साल की उम्र में पहली बार घर छोड़कर अपनी यात्रा शुरु की। उन्होंने यात्रा वृतांत को साहित्यिक रूप दिया इसलिए राहुल सांकृत्यायन को हिंदी यात्रा साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन के 45 वर्ष अपने घर से दूर अन्वेषण में बिताए। अपने जीवन के विभिन्न चरणों में राहुल सांकृत्यायन एक वैष्णव मठ के महंत, किसान आंदोलन कारी, बौद्ध भिक्षु, स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी थे। हालांकि उनका सबसे बड़ा योगदान अपनी यात्राओं के माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच प्राचीन संबंधों को फिर से उजागर करना और प्रचुर सामग्री भारत वापस लाना था। मिन्हाजू सिराज ने अपनी पुस्तक तबकात -ए-नासरी में 12वीं शताब्दी के अंत में नालंदा, विक्रमशिला और उदवंतपुरी के प्राचीन विश्वविद्यालयों के विध्वंश का वर्णन किया है। मुख्य रूप से बौद्ध शाक्य सम्प्रदाय के मठों में संग्रहित कई अमूल्य पांडुलिपियों को तिब्बत से वापस लाए। इन ग्रन्थों को पलायनकारी भिक्क्षु अपने साथ तिब्बत ले गए थे। तिब्बत के मौसम ने यह सुनिश्चित किया कि ये प्रकृति की अनिश्चितताओं से नष्ट न हो।महापंडित ने संस्कृत, पाली और अन्य भाषाओं में दुर्लभ पांडुलिपियों को प्राप्त करने के लिए तिब्बत में लगातार चार अभियानों का नेतृत्व किया और उनके प्रयासों ने बुद्ध की शिक्षाओं को पुनर्जीवित किया जो विलुप्तता के कगार पर थीं। अपने प्रयासों से वह न केवल इन दुर्लभ हिंदू और बौद्ध ग्रंथो की प्रतियां वापस लाए बल्कि उपमहाद्वीप की भूली हुई विरासत और इतिहास पर भी प्रकाश डाला। राहुल सांकृत्यायन ने स्वयं पाली सीखी और बौद्ध ग्रंथ “मध्यम निकाय” का अध्ययन किया जिसमें बौद्ध प्रवचनों का वर्णन है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, तिब्बत की उनकी यात्राएं अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से पूर्ण थी। जहां उन्होंने भारी कठिनाइयों का सामना किया, वहीं कुछ अनुभव बहुत अच्छे थे। उन्हें प्राचीन ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों के साथ-साथ भारतीय शैली की अमूल्य स्क्रॉल पेंटिंग भी मिली। 1926 में राहुल जी ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा ज्यादातर पैदल तय की। उस यात्रा में उनका साथी केवल एक कुत्ता था। तिब्बत की उनकी बाद की यात्राओं में घोड़े तथा खच्चर यात्रा के साधन थे। उन्होंने लिखा है कि उनके पास जो पैसे थे उनमें से ज्यादातर यात्रा खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं थे। वह आगे लिखते हैं कि उन्हें कभी दूसरों से पैसा उधार लेना पसंद नहीं था, लेकिन तिब्बत में उन्हें इस व्यक्तिगत प्रवृत्ति को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1933-34 में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने उल्लेखनीय साथी, मित्र, दार्शनिक, कलाकार और भिक्षु ‘गेदुन चोफेल’ से मुलाकात की। राहुलजी के अनुसार तिब्बत एक सुनहरा पुल था जिस पर वे एक-दूसरे से मिले थे। उनकी दोस्ती पारस्परिक सम्मान पर आधारित थी और दोनों ने एक-दूसरे की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित किया। वह गेदुन चोफेल को लेकर भारत वापिस लौटे जिसे तिब्बती विद्वान ने अपने सपने का साकार होना बताया।भारत और तिब्बत के बीच के प्रगाढ़ संबंधों को उजागर करना है। उनकी तिब्बत से 22 खच्चर भर लाई गई पांडुलिपियां अनमोल हैं।महापंडित ने अपने गांव के स्कूल में केवल उर्दू का अध्ययन किया था, लेकिन 30 से अधिक भाषाओं में स्व-शिक्षित थे और 12 से अधिक में पारंगत थे। उन्होंने यात्रा वृतांत से लेकर उपन्यास तक 140 से अधिक ग्रंथ लिखे। उनका सबसे बड़ा योगदान आम जनता के लिए प्राचीन बौद्ध ग्रंथों का सरल हिंदी में अनुवाद करना रहा, जिससे यह सर्वसुलभ हो गया। उन्होंने तिब्बती-हिन्दी शब्दकोश भी लिखा। मूल बौद्ध सिद्धांतों को पढ़ने के लिए उन्होंने स्वयं पाली सीखी। बाद में वे श्रीलंका गये जहां उन्होंने संस्कृत पढ़ाई।राहुल सांकृत्यायन द्वारा लाई गईं अधिकांश पांडुलिपियां काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान, पटना में संरक्षित हैं। श्री जयसवाल स्वयं एक प्रसिद्ध इतिहासकार और वकील थे जिन्होंने महापंडित को उनकी यात्राओं के वित्तपोषण और पांडुलिपियों के अनुवाद में सहायता की।राहुल सांकृत्यायन को साहित्य अकादमी और पद्म भूषण सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । उन्होंने त्रिपटक ग्रंथ का गहन अध्ययन किया और उन्हें’ त्रिपटकाचार्य’ की उपाधि दी गई । उनकी रचनाएं मुख्य रूप से हिंदी में हैं, जिसके कारण अंग्रेजी भाषी अभिजात वर्ग द्वारा इसे नजरअंदाज कर दिया गया है। उनके समकालीन ज्ञानी उन्हें विलक्षण प्रतिभा का धनी मानते थे। पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘मैं केवल एक ही राहुल को जानता हूं जो विलक्षण हैं।’हमारा देश वर्तमान में ‘सांस्कृतिक पुनरुद्धार’ पर की ओर अग्रसर है। हमें महापंडित जैसे लोगों का अध्ययन करने और उनके योगदान से सीखने की जरूरत है। राहुल सांकृत्यायन ने जनमानस की चेतना से मिटाए गए ग्रंथों को फिर से खोजा। उनका लेखन भारत और तिब्बत के बौद्ध संबंधों और विरासत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।महापंडित का जीवन ‘चरैवेति –चरैवेति’ वाक्यांश में समाहित है, जिसका अर्थ है निरंतर चलते रहो। ‘बदलाव’ भी उनके जीवन का उपयुक्त वर्णन होगा। राहुल सांकृत्यायन भारतीय ज्ञान तथा परंपरा के प्रतीक हैं जिसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने अपना समय एवं ऊर्जा, हमारे प्राचीन ग्रंथों और संस्कृति के अध्ययन की पुनः खोज और उनके माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच के संबंधों को और भी प्रगाढ़ करने में समर्पित किया जिसके लिये वह साधुवाद के भागी हैं।करीब 100 साल पहले राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लाई गई विश्व प्रसिद्ध पांडुलिपियां आज भी अपने पूर्ण संरक्षण और अनुवाद की प्रतीक्षा कर रही हैं। यह धरोहर न केवल धार्मिक है, बल्कि प्राचीन भारत-चीन और तिब्बत संबंधों का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण भी है।राहुल सांकृत्यायन ने वर्ष 1929 से 1938 के बीच चार बार तिब्बत की दुर्गम यात्राएं की थीं। उन यात्राओं के दौरान उन्होंने मठों और गांवों का सघन सर्वेक्षण कर करीब 10 हजार ग्रंथ एकत्र किए थे। इस विशाल संग्रह का मुख्य हिस्सा उन्होंने बिहार एंड ओडिशा रिसर्च सोसाइटी, पटना को सौंपा था, जबकि दुर्लभ पांडुलिपियों का एक विशेष हिस्सा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली को दिया गया। दिल्ली के धरोहर भवन में रखी इन पांडुलिपियों में सबसे अद्भुत ‘सेरडे’ संस्करण है, जिसमें 108 पोथियां शामिल हैं। ये पांडुलिपियां हस्तनिर्मित कागज पर शुद्ध सोने की स्याही से लिखी गई हैं, जिन्हें ‘कंजूर’ यानी बुद्ध के प्रत्यक्ष वचन कहा जाता है। ‘भोट’ लिपि में लिखे गए इन 845 ग्रंथों को 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण विश्व धरोहरों में गिना जाता है।ये ग्रंथ मात्र धार्मिक दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि 7वीं से 11वीं शताब्दी (अर्ली मेडिवल पीरियड) के उस दौर का इतिहास हैं जब लगभग 400 वर्षों तक नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी के विद्वान निरंतर तिब्बत और चीन की यात्रा करते थे। इन ग्रंथों में आचार्य पद्मसंभव, शान्तरक्षित और दीपांकर श्रीज्ञान जैसे विद्वानों के वृत्तांत दर्ज हैं। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 9 अप्रैल /2026