अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के ऊपर हमला किया था। अभी तक ईरान को लेकर जो साजिश इजरायल और अमेरिका ने रची थी, उसमें से कोई भी साजिश कामयाब नहीं हो पाई है। जिस तरह से ईरान पर हमला करके धर्मगुरु अयातुल्लाह खामेनेई और ईरान के प्रथम पंक्ति के नेताओं की इजरायल द्वारा हत्या की गई, स्कूल में मिसाइल दागकर 180 से ज्यादा बच्चियों की हत्या की गई, इसके बाद ईरान एकजुट हुआ। अपने धर्म गुरु की हत्या को शहादत मानते हुए संपूर्ण ईरान ने एकजुटता का परिचय दिया है। जिस तरह से कर्बला की जंग का इतिहास है लगभग उसी तरह से ईरान अब इस लड़ाई को लड़ रहा है। अमेरिका ने चीन और पाकिस्तान के माध्यम से एक बार फिर ईरान को वार्ता के लिए आमंत्रित करते हुए 15 दिन का सीजफायर दोनों ने स्वीकार किया था, लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू नहीं चाहते हैं कि अमेरिका युद्ध से बाहर हो। इजरायल ने लेबनान पर हमला किया, लेबनान ने जवाबी हमला किया। इसके बाद ईरान को भी इस कार्रवाई पर हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, जिसके कारण यह युद्धविराम हवा-हवाई की तरह है। युद्ध विराम चलेगा या नहीं इसको लेकर भी तरह-तरह की आशंका जताई जाने लगी हैं। अमेरिका द्वारा ईरान के ऊपर जो हमला किया गया है वह पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय नियम और कानून के अनुसार अवैध है। इजरायल और अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय कानून से ऊपर होकर पिछले कई वर्षों से फिलिस्तीन और गाजा पट्टी पर कहर बरपा रहे थे। नेतन्याहू और ट्रंप अपने आप को भगवान से भी ऊपर मानते हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री पिछले 20 वर्षों से ग्रेटर इजरायल का सपना दिखाकर सत्ता में बने हुए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहु के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के लिए यही फार्मूला अमेरिका में अपनाया। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के लिए अपना आदर्श भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मानते हैं। उन्होंने दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के लिए दक्षिणपंथी विचारधारा को अमेरिका में बढ़ाने का काम किया। उन्हें सफलता भी मिली। वह दूसरी बार राष्ट्रपति बन गए। उसके बाद उन्हें ऐसा लगा कि अमेरिका सारी दुनिया में नेतृत्व करता है। ऐसी स्थिति में वह जो चाहे कर सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के कानून का उल्लंघन करते हुए यह हमला किया है। उन्होंने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) से इसकी अनुमति नहीं ली। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 2 (4) का उल्लंघन किया। विश्व युद्ध के बाद जो अंतर्राष्ट्रीय कानून बने उनका भी इस युद्ध में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर उल्लंघन किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूएन के अनुच्छेद 52 का उल्लंघन किया गया है। युद्ध में नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जा सकता है। युद्ध के दौरान अस्पताल और चिकित्साकर्मियों के ऊपर किसी तरह का हमला नहीं हो सकता है। इसके बाद भी अमेरिका और इजरायल ने मिलकर जिस तरह की तबाही फिलिस्तीन, गाजा पट्टी, लेबनान और ईरान में मचाई है उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह भ्रम हो गया था कि वह दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकते हैं। वह जो चाहेंगे वही करेंगे। दुनिया के सभी देशों से पहले उन्होंने टैरिफ को लेकर अपनी ताकत का एहसास कराया। उसके बाद वह शांतिदूत बनकर सारी दुनिया के मसीहा बनना चाहते थे। जब वह सफल नहीं हुए तो उन्होंने गैंगस्टर की तरह काम करते हुए,,,, राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को रातों-रात सरकारी आवास से उठाकर अमेरिका में कैद कर दिया। वहां के तेल भंडारों पर कब्जा करते हुए अपने लोगों को बिठा दिया। इस सफलता के बाद उन्हें ऐसा लगने लगा था कि वह ईरान के साथ भी यही सब कर सकते हैं। पहले वहां पर खामेनेई के खिलाफ बगावत करवाकर सत्ता पलटने का प्रयास किया, जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ तो उन्होंने ईरान के ऊपर हमला कर दिया। उनको लग रहा था कि एक सप्ताह के अंदर वह ईरान को जीत लेंगे। ईरान पर उनका कब्जा हो जाएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। ट्रंप और नेतन्याहू के पाप का घड़ा भर चुका है। ट्रंप ने अपनी कुर्सी को बचाए रखने के लिए सीजफायर का दांव चला। इसमें उन्होंने चीन, पाकिस्तान और खाड़ी देशों की सहायता लेकर इस लड़ाई से बाहर निकलना चाह रहे थे, लेकिन नेतन्याहू इस लड़ाई से उन्हें बाहर नहीं निकलने देना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी असहमती दर्ज करा कर लेबनान के ऊपर हमला कर दिया। अब यह हमने फिर शुरू हो गए हैं, जिसके कारण एक बार फिर युद्ध के काले बादल मंडराने लगे हैं। सीज फायर के बाद आशा की जो किरण जागी थी, उसको लेकर एक बार पुनः आशंकाओं के बदले घिरने लगे हैं। धर्म युद्ध की इस लड़ाई में एक बात तो तय है कि ट्रंप और नेतन्याहू के पाप का घड़ा भर चुका है। कभी भी इनकी सत्ता जा सकती है। अमेरिका में ट्रंप की पार्टी के सांसदों ने विद्रोह शुरू कर दिया है। अमेरिका की जनता सड़कों पर आ रही है। कुछ इसी तरह की स्थिति इजरायल में भी देखने को मिल रही है। कहा जाता है धर्म युद्ध में सत्य की विजय होती है इस बार सत्य ईरान के साथ है। बहुत छोटी सी अर्थव्यवस्था और छोटी आबादी होने के बाद भी उसने जिस तरह से इन दोनों महा राक्षसों का मुकाबला किया है, उसकी प्रशंसा अब सारी दुनिया में हो रही है। लोगों को लगने लगा है, इस धर्म युग में राक्षसी प्रवृत्तियों का जल्द ही अंत होगा। ईएमएस / 09 अप्रैल 26