राष्ट्रीय
05-May-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। हर किसी को लगता है कि माता-पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा तय है, लेकिन सच्चाई इससे अलग है। कानून के मुताबिक हर बच्चे को हर तरह की प्रॉपर्टी पर हक नहीं मिलता। असली खेल इस बात पर टिका है कि संपत्ति पैतृक है या स्व-अर्जित। यही एक फर्क तय करता है कि आपको जन्म से अधिकार मिलेगा या सिर्फ उम्मीद ही रह जाएगी। अगर आपके पिता ने अपनी कमाई से घर या जमीन खरीदी है, तो वह उनकी ‘स्व-अर्जित’ संपत्ति है। इस पर उनका पूरा अधिकार है। वह जिसे चाहें यह संपत्ति दे सकते हैं या बेच सकते हैं। पिता चाहें तो बच्चे को इस संपत्ति से बेदखल भी कर सकते हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के मुताबिक अगर पिता को अपने पिता से विरासत में संपत्ति मिली है, तो वह भी उनकी व्यक्तिगत संपत्ति मानी जाती है, न कि बच्चों का उस पर दावा होता है। पैतृक संपत्ति वह होती है जो बिना बंटवारे के पिता के पक्ष की चार पीढ़ियों यानी पिता, दादा, परदादा और उनके ऊपर से चली आ रही हो। ऐसी संपत्ति पर बच्चों का जन्म से अधिकार होता है। पिता इसे अपनी मर्जी से किसी एक को नहीं दे सकते और न ही बेच सकते हैं। इसे बेचने या बांटने के लिए परिवार के सभी सदस्यों की सहमति जरूरी है। यदि संपत्ति स्व-अर्जित है और पिता की मौत बिना वसीयत बनाए हो जाती है, तभी बच्चों को ‘क्लास-1’ उत्तराधिकारी के रूप में संपत्ति में हिस्सा मिलता है, लेकिन अगर वसीयत बनी हुई है, तो कानून केवल वसीयत में लिखे शब्दों का पालन करेगा। सिराज/ईएमएस 05 मई 2026