हमारा सनातन धर्म अनेक विशेषताओं से परिपूर्ण है। इसके प्रत्येक प्रतीक किसी न किसी सद्भावना, मानवता के लिए कल्याणकारी तथा विश्वबंधुत्व की भावना से ओतप्रोत है। इस लेख में कतिपय प्रमुख प्रतीकों की सार्थकता का वर्णन किया है- १. : सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को उद्घोषित करने वाली मूल ध्वनि úÓ है। इसके उच्चारण मात्र से एकाग्रता, मानसिक शान्ति और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार की अनुभूति होती है। इससे उत्पन्न कम्पन से नकारात्मकता नष्ट होती है और विचारों में सकारात्मकता आती है। धार्मिक ग्रन्थों में कई श्लोकों का प्रारंभ ध्वनि से होता है। भूर्व स्व: तत् सवितु: वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि। (गायत्री मन्त्र) नमो भगवते वासुदेवाय (भागवत् पुराण) इत्याक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् (श्रीमद् भगवत् गीता अध्याय ८/१३) नम: शिवाय (शिवजी का अति प्राचीन, प्रसिद्ध मन्त्र) त्र्यम्बकं यजामहे (महामृत्युंजय मंत्र) भद्रंकर्णेभि: शृणुयाम् देवा: (श्रीगणपति अथर्वशीर्ष) हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम्। (श्रीसूक्त, ऋग्वेद) यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। (मन्त्र पुष्पांजलि) २. स्वस्तिक - स्वस्तिक शुभ्रता और कल्याण का प्रतीक है। यह मंगल का प्रतीक भी है। किसी भी शुभ कार्य को प्रारम्भ करने के पूर्व स्वस्तिक बनाया जाता है। कलश स्थापना के पूर्व स्वस्तिक बनाकर उस पर गेहूँ या चावल रखकर आम के पत्ते लगाकर कलश स्थापित किया जाता है। उस पर नारियल रखा जाता है। घर के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक का चिह्न बनाया जाता है। कहा जाता है कि स्वस्तिक भगवान विष्णु और सूर्य का प्रतीक है। किसी भी शुभ पूजन, वैवाहिक सामग्री आदि सभी में सर्वप्रथम स्वस्तिक बनाया जाता है। नववधू भी देहली पूजन में कुंकूम से स्वस्तिक बनाती है। स्वस्तिक की चार भुजाएँ होती है जो धर्म, अर्थ, काम और चमकीला रंग शुभता का प्रतीक है। कई देवालयों में अपनी इच्छापूर्ति की आकांक्षा से उल्टे स्वस्तिक बनाने की परम्परा है। इच्छा पूर्ति पूर्ण होने पर स्वस्तिक को सीधा भी किया जाता है। ३. कमल : यह वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय पुष्प है। यह ब्रह्मा, विष्णु, सरस्वती तथा लक्ष्मी का विशेष प्रिय पुष्प है। यह पवित्रता, शुभता और कल्याण का प्रतीक है। यह जीवन में अनासक्तता का प्रतीक भी है। कीचड़ में रहकर भी अति सुन्दर पुष्प है। मानव को विद्वानों द्वारा यह सलाह दी जाती है कि उसे भी इस संसार में कमल के समान जीवन व्यतीत करना चाहिए। ४. दीपक : दीपक अन्धकार को दूर कर हमें प्रकाश की ओर ले जाता है। अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश के पथ पर अग्रसर करता है। सकारात्मकता की ओर हमारा मार्गदर्शन करता है। दीपक कई प्रकार होते हैं। इन्हें विभिन्न प्रकार के बाती, घी, तेल से प्रज्वलित किया जाता है। इनमें गाय का शुद्ध घी, मूँगफली तेल, तिल का तेल तथा सरसों तेल प्रमुख है। भारतीय घरों में प्रात:कालीन पूजा में तथा सायंकालीन पूजन में दीपक जलाया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित मंत्र बोला जाता है- शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धन सम्पदाम्। शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीपो ज्योति नमोस्तुते।। (आत्मबुद्धि प्रकाशाय) तुलसी माता के चौरे पर भी दीपक जलाया जाता है। दीप प्रज्वलन से भक्त के मन में आध्यात्मिक के भाव जाग्रत होते हैं। भारतीय संस्कृति में किसी भी कार्यक्रम को प्रारंभ करने पर अतिथि द्वारा दीप प्रज्वलित किया जाता है। यह परम्परा युगों से चली आ रही है। घरों में किसी की मृत्यु होने पर उसकी स्मृति में फोटो के सामने दीपक जलाया जाता है। ५. कलश : यह पवित्रता का द्योतक है। किसी भी प्रकार के शुभ कार्य करने के पूर्व कलश की स्थापना विधिवत की जाती है। ये कई प्रकार के होते हैं- यथा मिट्टी, ताम्बा, पीतल, स्टील, रजत, स्वर्ण आदि। कलश की स्थापना के पूर्व उसके नीचे गेहूँ या चावल रखे जाते हैं। स्वस्तिक भी बनाया जाता है। कथा, प्रवचन, नूतन गृह प्रवेश, यज्ञ, नवग्रह पूजन, विवाह, उपनयन आदि सभी शुभ कार्यों में कलश की स्थापना की जाती है। धार्मिक ग्रन्थों का कथन है कि कलश में ईश्वर का वास रहता है। ६. शंख : किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में शंख ध्वनि की जाती है। शंख को लक्ष्मीजी का भाई कहा जाता है। इसकी ध्वनि नकारात्मकता को नष्ट करती है और सकारात्मकता को लाती है। पूजन कार्य में पवित्रता लाती है। चिकित्सकीय दृष्टि से शंख बजाने से फेफड़ों का व्यायाम हो जाता है। इसमें रखा जल हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है। यदि किसी व्यक्ति की वाणी में दोष हो तो शंख बजाने से वह दूर होता है। पूजा में शंख रखने से घर के वास्तु दोष दूर होते हैं। शंख ध्वनि से देवताओं का आह्वान किया जाता है। शंख तीन प्रकार के होते हैं। (अ) दक्षिणावर्ती : यह अत्यन्त शुभ माना जाता है। यह माता लक्ष्मी और विष्णुजी को विशेष प्रिय है। यह दायीं ओर खुलता है। (ब) वामावर्ती : बायीं ओर खुलने वाला यह धन धान्य के लिए शुभ होता है। (स) गणेश शंख : गणेशजी के समान दिखता। संतान सुख देने वाला कहा जाता है। ७. त्रिशूल : भगवान शिव का अत्यधिक प्रिय अस्त्र है। इसके तीन शूल सत, रज और तम के द्योतक है। यह तीन शक्तियाँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया का प्रतिनिधि है। त्रिशूल नकारात्मकता को दूर करता है। भक्तों में सुरक्षात्मकता का भाव प्रदान होता है। इससे शिवजी की असीमित शक्ति का ज्ञान होता है। भक्तों को बुरी शक्तियों से बचाता है। यह एक अस्त्र ही नहीं वरन् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की व्यवस्था को नियंत्रित करता है। ८. सूर्य : वेदों में सूर्य को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का देवता माना गया है। यह जीवन प्रदाता है। गायत्री मंत्र सूर्य को समर्पित है। सूर्य के वाहन सात घोड़े हैं। धर्म ग्रन्थों के अनुसार इनका रंग श्वेत है। कहा जाता है कि ये सूर्य की सात किरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्द्र धनुष के सात रंग संयुक्त रूप से श्वेत प्रकाश निर्मित करते हैं। सूर्य ऊर्जा, ज्ञान और प्रकाश का नियन्ता है। पृथ्वी पर जीवन, वनस्पति, वायु, जल सभी सूर्य के कारण ही सम्भव है। इससे आधुनिक समय में सौर ऊर्जा प्राप्त हो रही है। अदिति और कश्यप को वेदों में सूर्य का देवता माना गया है। ९. चन्द्रमा : यह एक प्राकृतिक उपग्रह है, जो सूर्य से प्रकाशित होता है। पृथ्वी पर समुद्र में ज्वार-भाटा चन्द्रमा के कारण होता है। विज्ञान के अनुसार चन्द्रमा पर पानी बर्फ के रूप में विद्यमान है। वहाँ हवा नहीं है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक है। वैज्ञानिक चन्द्रमा पर चन्द्रयान भेजते हैं। भारत भी चन्द्रमा पर यान भेजने वाला छटा देश बन गया है। चन्द्रमा पर आक्सीजन नहीं है। चन्द्रमा सभी के आकर्षण का केन्द्र रहा है। बच्चे इसे चंदा मामा कहते हैं। श्रीकृष्णजी ने बाल्यावस्था में अपनी यशोदा मैया से चन्द्र खिलौना लेने की जिद की थी। शरद पूर्णिमा पर चन्द्रमा की चाँदनी का विशेष महत्व है। इस चाँदनी रात में दूध या खीर चाँदनी में रख कर चन्द्रमा को नैवेद्य लगाते हैं। मान्यता है कि चन्द्रमा इसमें अमृत वर्षण करते हैं। सभी भक्तगण इस नैवेद्य को ग्रहण करते हैं। इस चाँदनी से नेत्र ज्योति बढ़ती है। १०. पताका : पताका झंडे का ही स्वरूप होती है। इसका आकार तिकोना होता है। सनातन धर्म में मंदिरों के शिखर पर ध्वज के रूप में इसे लगाया जाता है। इस पर विशेष प्रकार के चिह्न बने होते हैं। राजाओं के रथ पर भी पताका फहराती है। भगवान श्रीराम के रथ पर कोविदार वृक्ष के पत्तों के चिह्न वाली पताका थी। यह कथन वाल्मीकि रामायण में है। सूर्य देव का चिह्न भी अंकित रहता है क्योंकि श्रीराम सूर्यवंशी हैं। पताका का रंग लाल होता था। लक्ष्मण जी ने भरत आगमन को चित्रकूट में इसी प्रकार की पताका के आधार पर पहचान लिया था। भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ पर सारथी के रूप ेमं बैठे थे। उस रथ पर हनुमानजी के चित्र वाली पताका लगी थी। इसे कपिध्वज कहा जाता है। यह लाल रंग की थी। कृष्ण के रथ पर गरुड़ का चिह्न था। जब उन्होंने सात्यकि से युद्ध किया था। रावण की पताका पर मानव खोपड़ी का चिह्न था। वह शिवभक्त था। पौराणिक ग्रन्थों में वीणा और शमी पत्र का चिह्न भी दर्शाया गया है। सफेद पताका का विशेष महत्व होता है। युद्ध विराम के समय सफेद पताका लहराई जाती है। सफेद पताका शान्ति और आपसी मित्रता का प्रतीक है। ११. गरुड़ घंटी : मधुर ध्वनि से बजने वाली यह घंटी प्राय: सभी घरों में और मंदिरों में रखी जाती है। सामान्यत: यह पीतल की होती है। आरती करते समय तथा नैवेद्य लगाते समय इसे एक हाथ से बजाया जाता है। यह गरुड़ देवता का अवतार मानी गई है। गरुड़जी विष्णु के वाहन हैं। घंटी की ध्वनि से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार नमस्ते, षटकोण, अष्टलक्ष्मी, मछली को भी प्रतीक चिह्न माना जाता है। वर्तमान पीढ़ी के लिए यह आवश्यक है कि वे इस प्रतीक चिह्नों के बारे में जानकारी प्राप्त करें। हमारे धार्मिक पर्यटन स्थलों में ये चिह्न स्थान स्थान पर पत्थरों पर उकेरे हुए देखे जा सकते हैं। ये अति आवश्यक चिह्न हैं। हर प्रतीक चिह्न की अपनी अलग-अलग विशेषता रहती है। इनके बारे में नवागत पीढ़ी को जानकारी रखनी चाहिए। .../ 18 मई /2026