- कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी बिकवाली ने बढ़ाई मुश्किलें नई दिल्ली (ईएमएस)। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में है और हाल ही में रिकॉर्ड निचले स्तर 96.14 प्रति डॉलर तक पहुंच गया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कई कारकों ने रुपये पर चौतरफा दबाव बढ़ाया है, जिससे इसकी स्थिति और नाजुक हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौजूदा हालात नहीं सुधरे तो रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब जा सकता है। रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों के चलते विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी बाजारों की ओर बढ़ रहे हैं। जब ये निवेशक रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। इसके अलावा, दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता या युद्ध जैसे हालात होने पर निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर अमेरिकी डॉलर की ओर रुख करते हैं, जिससे उसकी मांग और बढ़ जाती है। भारत अपनी 90 फीसदी से अधिक तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की मौजूदा ऊंची कीमतें (लगभग 111 डॉलर प्रति बैरल) देश के आयात बिल को बढ़ा रही हैं, जो रुपये पर और दबाव डालता है। मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है, जिससे डॉलर को सुरक्षित आश्रय के रूप में देखा जा रहा है। कमजोर रुपये का सबसे बड़ा असर आयात पर निर्भर सेक्टरों जैसे एविएशन, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और एफएमसीजी पर पड़ेगा, क्योंकि उनकी लागत बढ़ जाएगी। इससे स्मार्टफोन, लैपटॉप, लग्जरी कार और कई दवाइयां महंगी हो सकती हैं, जिससे आम लोगों पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। हालांकि, कुछ सेक्टरों को फायदा भी मिल सकता है। आईटी सर्विसेज, फार्मा, टेक्सटाइल और स्पेशलिटी केमिकल्स जैसी निर्यात आधारित कंपनियों की कमाई बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें डॉलर में भुगतान मिलता है और रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिलती है। इससे भारतीय उत्पादों का निर्यात भी विदेशों में सस्ता हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो रुपया 100 के स्तर के करीब जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) रुपये को स्थिर रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग और मौद्रिक नीति में बदलाव जैसे कदम उठा सकता है। हालांकि, सिर्फ विनिमय दर ही अर्थव्यवस्था की ताकत नहीं है; भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद ऐसे दबावों से निपटने में सक्षम मानी जाती है, लेकिन महंगाई और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। सतीश मोरे/18मई ---