राज्य
15-Jun-2026
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- 6000 करोड़ खर्च के बाद भी राष्ट्रीय औसत से अधिक गंभीर स्थिति भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश में कुपोषण के खिलाफ वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, आंगनबाड़ी नेटवर्क का विस्तार किया गया है और पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) की संख्या बढ़ाई गई है। इसके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-6 की ताजा रिपोर्ट प्रदेश के लिए चिंता बढ़ाने वाली है। रिपोर्ट बताती है कि कुपोषण के कई प्रमुख संकेतकों में सुधार के बजाय गिरावट दर्ज की गई है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर योजनाओं पर खर्च हो रहे हजारों करोड़ रुपये का अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दिख रहा। एनएफएचएस-6 (2023-24) के अनुसार मध्य प्रदेश में तीव्र कुपोषण (वेस्टिंग) की दर 23.8 प्रतिशत पहुंच गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 19.3 प्रतिशत है। चार वर्ष पहले एनएफएचएस-5 में यह आंकड़ा 18.9 प्रतिशत था। यानी प्रदेश में तीव्र कुपोषण के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कम वजन (अंडरवेट) वाले बच्चों की स्थिति भी चिंताजनक है। वर्ष 2019-21 में यह दर 33 प्रतिशत थी, जो अब बढक़र 39.7 प्रतिशत हो गई है। इस श्रेणी में मध्य प्रदेश देश के सबसे खराब प्रदर्शन वाले राज्यों में शामिल हो गया है। गंभीर वेस्टिंग के मामले भी बढ़े हैं, जो दर्शाता है कि बच्चों को पर्याप्त और संतुलित पोषण नहीं मिल पा रहा। ठिगनेपन में कमी, लेकिन खतरा बरकरार स्टंटिंग यानी उम्र के अनुसार कम ऊंचाई वाले बच्चों की संख्या में कुछ कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा 35.7 प्रतिशत से घटकर 31.4 प्रतिशत हो गया है। हालांकि यह सुधार सकारात्मक माना जा सकता है, लेकिन अब भी प्रदेश का लगभग हर तीसरा बच्चा ठिगनेपन का शिकार है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टंटिंग में सुधार के बावजूद वेस्टिंग और अंडरवेट में वृद्धि यह संकेत देती है कि पोषण संकट अभी भी गहराई से मौजूद है। खर्च बढ़ा, लेकिन परिणाम नहीं राज्य सरकार महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा विभागों के माध्यम से कुपोषण उन्मूलन पर प्रतिवर्ष लगभग 6000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। वर्ष 2026-27 के बजट में केवल पोषण 2.0 और सक्षम आंगनबाड़ी कार्यक्रम के लिए ही 3863 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि कई क्षेत्रों में पोषण आहार की गुणवत्ता, वितरण व्यवस्था, निगरानी तंत्र और लाभार्थियों की नियमित ट्रैकिंग में कमियां बनी हुई हैं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्थिति अधिक गंभीर दिखाई देती है। एनआरसी से घर लौटने के बाद फिर कुपोषित गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों में भर्ती कर विशेष उपचार और पोषण दिया जाता है। लेकिन चुनौती तब सामने आती है जब बच्चे घर लौटते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार 10 से 20 प्रतिशत बच्चे स्वस्थ होकर लौटने के बाद फिर से कुपोषित हो जाते हैं क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति, भोजन की उपलब्धता और पोषण संबंधी जागरूकता पर्याप्त नहीं होती। इससे स्पष्ट है कि कुपोषण केवल स्वास्थ्य विभाग की समस्या नहीं है, बल्कि गरीबी, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, मातृ स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता से जुड़ा बहुआयामी संकट है। विनोद / 15 जून 26