राज्य
15-Jun-2026
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- 2019 के बाद नहीं हुआ सर्वे, बारिश में बढ़ सकता है खतरा भोपाल (ईएमएस)। मानसून की दस्तक के साथ राजधानी भोपाल में जर्जर इमारतों का मुद्दा एक बार फिर चिंता का कारण बन गया है। हैरानी की बात यह है कि शहर में खतरनाक घोषित भवनों का आखिरी व्यापक सर्वे वर्ष 2019 के आसपास हुआ था, जबकि उसके बाद से कोई समग्र समीक्षा नहीं की गई। ऐसे में प्रशासन के पास यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि वर्तमान में कितनी इमारतें गिरने की स्थिति में पहुंच चुकी हैं। नगर निगम और संबंधित एजेंसियों के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2016 के सर्वे में शहर की 372 इमारतों को जर्जर और खतरनाक श्रेणी में चिह्नित किया गया था। इसके बाद कुछ भवनों को तोड़ा गया, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे निर्माण आज भी आबादी के बीच खड़े हैं। हर साल बारिश से पहले जर्जर भवनों की पहचान और कार्रवाई की बात कही जाती है, लेकिन इस बार अब तक किसी बड़े सर्वे अभियान की जानकारी सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सात साल पुराने आंकड़ों के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था तय करना जोखिम भरा हो सकता है। इस दौरान न केवल पुराने भवन और कमजोर हुए हैं, बल्कि कई अन्य निर्माण भी समय के साथ जर्जर श्रेणी में पहुंच चुके होंगे। इसके बावजूद शहर में जोखिम वाले भवनों का अद्यतन डाटाबेस उपलब्ध नहीं है। बारिश बढ़ाती है खतरा सिविल इंजीनियरों के अनुसार लगातार बारिश, सीलन, कमजोर नींव और रखरखाव की कमी जर्जर इमारतों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है। कई बार भवन बाहर से सुरक्षित दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी आंतरिक संरचना गंभीर रूप से कमजोर हो चुकी होती है। घनी आबादी वाले इलाकों में ऐसी इमारतें केवल उसमें रहने वालों के लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के दुकानदारों, राहगीरों और पड़ोसी मकानों के लिए भी खतरा बन जाती हैं। बारिश में बढ़ जाता है खतरा मानसून के दौरान लगातार बारिश, सीलन और भवनों की कमजोर होती संरचना के कारण जर्जर इमारतों के गिरने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते सर्वे और कार्रवाई नहीं की गई तो किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्थित ऐसे भवन आसपास के लोगों और राहगीरों के लिए भी गंभीर खतरा बने हुए हैं। नगर निगम अधीक्षण यंत्री (सिविल) आर आर जारोलिया ने कहा कि हमने हाउसिंग बोर्ड और भोपाल विकास प्राधिकरण को नोटिस जारी किया है। जर्जर इमारतों, अति जर्जर इमरतों की वास्तविक स्थिति के बारे में जानकारी मांगी है। जानकारों का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों या संस्थाओं से जुड़े कुछ जर्जर भवनों के खिलाफ अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई जाती। यही कारण है कि कई खतरनाक घोषित भवन वर्षों बाद भी जस के तस खड़े हैं। वर्ष 2016 से 2019 के बीच नगर निगम ने करीब तीन दर्जन जर्जर निर्माणों को ध्वस्त किया था, लेकिन उसके बाद कार्रवाई की रफ्तार धीमी पड़ गई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या सुरक्षा से ज्यादा प्राथमिकता विवादों और विरोध से बचने को दी जा रही है। एजेंसियों के बीच समन्वय का अभाव भोपाल में जर्जर भवनों का मामला केवल नगर निगम तक सीमित नहीं है। कई भवन मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड, भोपाल विकास प्राधिकरण और अन्य सरकारी संस्थाओं के अधीन भी आते हैं। ऐसे में जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई करने में अक्सर देरी हो जाती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण खतरनाक भवनों की समस्या वर्षों से बनी हुई है। शहरी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि जर्जर भवनों के मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली अक्सर हादसे के बाद कार्रवाई वाली रही है। जबकि जरूरत इस बात की है कि मानसून से पहले व्यापक सर्वे कर जोखिम वाले भवनों की सूची सार्वजनिक की जाए और आवश्यक होने पर उन्हें खाली कराया जाए। हर वर्ष बारिश से पहले जर्जर इमारतों की पहचान कर नोटिस जारी करने और आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही जाती है, लेकिन इस बार अब तक किसी बड़े सर्वे या अभियान की जानकारी सामने नहीं आई है। विनोद / 15 जून 26